महिला उत्तराधिकारियों को कम हिस्सा मिलने का दावा
नई दिल्ली (आरएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को उस जनहित याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा, जिसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत विरासत और उत्तराधिकार से जुड़े बिना संहिताबद्ध नियमों को लैंगिक आधार पर भेदभावपूर्ण बताते हुए उनकी संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। याचिका में मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों के समान विरासत और उत्तराधिकार का अधिकार देने की मांग की गई है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत तथा न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने याचिकाकर्ता इम्तियाजहुसैन शाहबुद्दीन मुल्ला की याचिका पर सुनवाई की। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता एम. सिंह और अनिल सी. निशानी ने दलीलें रखीं। अधिवक्ताओं ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत पुरुष और महिला उत्तराधिकारियों के बीच किया जाने वाला कथित असमान व्यवहार संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 में दिए गए मौलिक अधिकारों के विपरीत है। सुप्रीम कोर्ट की 23 सितंबर की कार्यसूची में भी इसी पीठ की सुनवाई दर्ज है।
याचिका में दावा किया गया है कि मौजूदा व्यवस्था लैंगिक आधार पर असमानता पैदा करती है। इसमें कहा गया है कि कुछ परिस्थितियों में महिला उत्तराधिकारियों को उनके पुरुष समकक्षों की तुलना में आधा हिस्सा मिलता है और उन्हें पैतृक तथा पारिवारिक संपत्ति में पुरुषों के समान अधिकार नहीं मिलते। याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मुस्लिम महिलाओं के लिए विरासत और उत्तराधिकार के समान अधिकार सुनिश्चित करने के निर्देश देने का आग्रह किया गया है।याचिकाकर्ता ने संपत्ति और उत्तराधिकार के मामलों में लैंगिक समानता के अधिकार को स्पष्ट करने की मांग की है। इसमें पैतृक और पारिवारिक संपत्ति को भी शामिल करने का अनुरोध किया गया है। याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) अनुप्रयोग अधिनियम, 1937 के तहत बिना वसीयत के उत्तराधिकार से संबंधित नियमों को कानूनी मान्यता दिए जाने को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस कानून के तहत मुस्लिम पक्षकारों के मामलों में बिना वसीयत के उत्तराधिकार जैसे विषयों पर मुस्लिम पर्सनल लॉ के आधार पर निर्णय किया जाता है, जबकि उत्तराधिकार के मूल नियमों का बड़ा हिस्सा संहिताबद्ध नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के एक फैसले में भी 1937 के कानून की धारा 2 के संदर्भ में यह दर्ज किया गया है कि मुस्लिम पक्षकारों के बीच बिना वसीयत के उत्तराधिकार सहित कुछ मामलों में निर्णय का आधार मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) होगा।
याचिका पर दलील देते हुए अधिवक्ता अनिल सी. निशानी ने तर्क दिया कि पर्सनल लॉ को संवैधानिक जांच से स्वत: बाहर नहीं रखा जा सकता, खासकर तब जब किसी प्रावधान या नियम को मौलिक अधिकारों के विपरीत बताया जा रहा हो। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के शायरा बानो मामले में दिए गए फैसले का भी हवाला दिया।
याचिका में कहा गया है कि उत्तराधिकार के नियमों में पुरुष और महिला उत्तराधिकारियों के बीच अंतर संविधान में निहित समानता के सिद्धांत की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। हालांकि, इस मामले में अभी सुप्रीम कोर्ट ने इन दावों की वैधता पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। बुधवार की सुनवाई में अदालत ने केंद्र सरकार से जवाब मांगते हुए मामले की न्यायिक जांच आगे बढ़ाने पर सहमति जताई।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में युवा मामले एवं खेल मंत्रालय तथा कानून एवं न्याय मंत्रालय को नोटिस जारी किए हैं। अब मामले में केंद्र सरकार का जवाब महत्वपूर्ण होगा। याचिका पर आगे की सुनवाई में अदालत मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत उत्तराधिकार से जुड़े नियमों और उनके संवैधानिक परीक्षण से संबंधित उठाए गए सवालों पर विचार करेगी।








