नई दिल्ली (आरएनएस)। पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से निपटने के दावों के बीच पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक-2026 में भारत का प्रदर्शन चिंता बढ़ाने वाला है। सूचकांक में 177 देशों का विभिन्न पर्यावरणीय मानकों पर आकलन किया गया, जिसमें भारत 22.46 अंक के साथ 176वें स्थान पर रहा। यानी भारत सूचकांक में सबसे निचले पायदान से केवल एक स्थान ऊपर है। भारत से नीचे केवल एक देश है।हालांकि पिछले एक दशक में भारत के पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक के स्कोर में 7.47 अंकों का सुधार हुआ है, लेकिन पर्यावरणीय स्वास्थ्य, पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन से निपटने के क्षेत्र में गंभीर चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं। रिपोर्ट के अनुसार वायु प्रदूषण, कमजोर कचरा प्रबंधन, जैव विविधता की हानि, अपर्याप्त अपशिष्ट जल उपचार और भविष्य में उत्सर्जन बढऩे का जोखिम भारत की खराब स्थिति के प्रमुख कारण हैं।
भारत की खराब रैंकिंग में सबसे बड़ा योगदान कमजोर पर्यावरणीय स्वास्थ्य प्रदर्शन का है। इस श्रेणी में भारत का स्कोर 15.13 रहा और वह 174वें स्थान पर है। वायु गुणवत्ता में भारत 175वें स्थान पर है और उसका स्कोर केवल 7.89 रहा। सूक्ष्म कण पीएम2.5 से संबंधित संकेतक में भारत का स्कोर महज 0.49 है। कार्बन मोनोऑक्साइड के संपर्क का स्कोर शून्य तथा सल्फर डाइऑक्साइड के संपर्क का स्कोर 8.94 रहा।
ये आंकड़े वाहनों से निकलने वाले धुएं, औद्योगिक उत्सर्जन, कोयले से उत्पादित ऊर्जा और जैव-ईंधन जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण की गंभीरता को रेखांकित करते हैं।
स्वच्छता और पेयजल के क्षेत्र में भारत ने पिछले दस वर्षों में सुधार किया है। इस क्षेत्र में भारत का स्कोर 26.35 रहा, जो एक दशक में 8.33 अंकों के सुधार को दर्शाता है।असुरक्षित स्वच्छता का स्कोर 27.05 रहा, जबकि असुरक्षित पेयजल का स्कोर 25.88 है। रिपोर्ट के मुताबिक इन दोनों क्षेत्रों में सुधार के बावजूद स्थिति अभी भी सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए चुनौती बनी हुई है।कचरा प्रबंधन की स्थिति भी कमजोर है। उचित तरीके से प्रबंधित ठोस कचरे के मामले में भारत का स्कोर केवल 18.40 रहा और वह 141वें स्थान पर है।
पारिस्थितिकी तंत्र की जीवनक्षमता के मामले में भारत का स्कोर 22.82 रहा और उसे 171वां स्थान मिला।
जैव विविधता एवं आवास संरक्षण में भारत की स्थिति और खराब है। इस श्रेणी में भारत का स्कोर केवल 9.09 है और वह 174वें स्थान पर है।
स्थलीय जैव-क्षेत्र संरक्षण का स्कोर 1.13, संरक्षित क्षेत्र प्रतिनिधित्व का 3.58 और संरक्षित क्षेत्र संपर्क का स्कोर केवल 0.60 रहा। ये आंकड़े प्राकृतिक आवासों और जैव विविधता के संरक्षण में मौजूद गंभीर चुनौतियों को दर्शाते हैं।
जैव विविधता से संबंधित सूचकांक में पिछले दस वर्षों में 9.05 अंकों की गिरावट भी दर्ज की गई है। इससे संकटग्रस्त प्रजातियों और उनके प्राकृतिक आवासों पर बढ़ते दबाव का संकेत मिलता है।
वन क्षेत्र में भारत का स्कोर 17.97 रहा है। पिछले दस वर्षों में इसमें करीब 3.96 अंकों की गिरावट आई है।
पेड़ों के आवरण में कमी से संबंधित संकेतक का स्कोर 16.71 रहा। भूमि उपयोग में बदलाव, बुनियादी ढांचे के विस्तार और विकास गतिविधियों के बढ़ते दबाव को वन क्षेत्र के लिए प्रमुख चुनौती माना गया है।
प्राकृतिक आवासों का विखंडन और विकास परियोजनाओं के कारण भूमि उपयोग में बदलाव भी जैव विविधता एवं वन्यजीव संरक्षण के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।
कृषि क्षेत्र में भारत की स्थिति मिश्रित है। सापेक्ष फसल उपज के मामले में भारत ने 100 अंक के साथ पहला स्थान हासिल किया है। यह देश की कृषि उत्पादकता को दर्शाता है।
हालांकि, कृषि के पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर रिपोर्ट ने चिंता जताई है। कीटनाशक प्रदूषण जोखिम का भारत का स्कोर 45.75 रहा, जिसमें पिछले दस वर्षों में 17.16 अंकों की गिरावट आई है। फास्फोरस की अधिकता से संबंधित संकेतक का स्कोर 38.89 रहा।
इन आंकड़ों से कृषि में रासायनिक पदार्थों के बढ़ते इस्तेमाल और पोषक तत्वों से होने वाले पर्यावरणीय प्रदूषण की चुनौती सामने आती है।
जलवायु परिवर्तन शमन के मामले में भारत का स्कोर 28.01 रहा और वह 130वें स्थान पर है।
रिपोर्ट के अनुसार जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता, बढ़ती ऊर्जा मांग और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में वृद्धि भारत के सामने प्रमुख चुनौतियां हैं।
वर्ष 2050 के अनुमानित उत्सर्जन से जुड़े संकेतक में भारत का स्कोर शून्य रहा। यह भविष्य में उत्सर्जन कम करने की राह में मौजूद बड़ी चुनौतियों की ओर संकेत करता है।
समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र और मत्स्य संसाधन प्रबंधन में भी भारत का प्रदर्शन कमजोर रहा। मत्स्य पालन का स्कोर 32.69 रहा, जबकि क्षेत्रीय समुद्री पोषण सूचकांक का स्कोर 38.70 है। इस संकेतक में पिछले दस वर्षों में गिरावट दर्ज की गई है।
समुद्री संसाधनों पर बढ़ता दबाव और समुद्री आवासों के संरक्षण की चुनौतियां भारत के पर्यावरणीय प्रदर्शन को प्रभावित कर रही हैं।
पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक-2026 में उत्तरी यूरोप के बाल्टिक क्षेत्र में स्थित एस्टोनिया ने 74.79 अंक के साथ पहला स्थान हासिल किया है। एस्टोनिया की बेहतर रैंकिंग के पीछे मजबूत पर्यावरणीय प्रशासन, स्वच्छ तकनीकों का उपयोग, प्रभावी कचरा प्रबंधन और मजबूत जलवायु नीतियों को प्रमुख कारण माना गया है।
पर्यावरणीय स्वास्थ्य में एस्टोनिया का स्कोर 75.88 है, जबकि भारत का 15.13 है। वायु गुणवत्ता में एस्टोनिया को 80.76 अंक मिले, जबकि भारत का स्कोर केवल 7.89 है।
ठोस कचरा प्रबंधन में एस्टोनिया का स्कोर 100 है, जबकि भारत 18.40 अंकों पर है। अपशिष्ट जल उपचार में भी एस्टोनिया का स्कोर 91.69 है, जबकि भारत का स्कोर 28.83 रहा।
पारिस्थितिकी तंत्र की जीवनक्षमता में एस्टोनिया 63.66 अंक के साथ आठवें स्थान पर है, जबकि भारत 22.82 अंकों के साथ 171वें स्थान पर है।
जैव विविधता संरक्षण में एस्टोनिया का स्कोर 67.06 है, जबकि भारत का केवल 9.09 है। इससे दोनों देशों के बीच प्राकृतिक आवास और जैव विविधता संरक्षण की स्थिति में बड़ा अंतर सामने आता है।
जलवायु परिवर्तन शमन में एस्टोनिया 90.58 अंक के साथ पहले स्थान पर है। इसके मुकाबले भारत 28.01 अंक के साथ 130वें स्थान पर है।
एस्टोनिया के वर्ष 2050 के अनुमानित उत्सर्जन संकेतक में भी 100 अंक हैं। इसके विपरीत भारत का स्कोर शून्य है। यह दोनों देशों की भविष्य की उत्सर्जन नीति और ऊर्जा संक्रमण की दिशा में बड़ा अंतर दर्शाता है।
केंद्र फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की ओर से 4 जून को जारी ‘भारत के पर्यावरण की स्थिति-2026’ रिपोर्ट के पर्यावरण वर्ग में गोवा को देश का शीर्ष राज्य बताया गया है।
गोवा के बाद असम, आंध्र प्रदेश, त्रिपुरा और ओडिशा का स्थान बताया गया है। वहीं पश्चिम बंगाल सबसे निचले पायदान पर रहा। राजस्थान, तमिलनाडु, बिहार और पंजाब भी निचले प्रदर्शन वाले राज्यों में शामिल रहे।
केंद्र शासित प्रदेशों में चंडीगढ़ शीर्ष पर रहा, जबकि पुडुचेरी का प्रदर्शन सबसे कमजोर रहा।
पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक के लिए वैज्ञानिक रूप से विश्वसनीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तुलनीय पर्यावरणीय आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है। आंकड़ों को प्रासंगिकता, सत्यापन, पूर्णता, नवीनता और सार्वजनिक उपलब्धता जैसे मानकों पर परखा जाता है।
वर्ष 2026 के सूचकांक में 47 संकेतक शामिल हैं। इन्हें तीन प्रमुख नीतिगत उद्देश्यों के अंतर्गत रखा गया है—पर्यावरणीय स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिकी तंत्र की जीवनक्षमता।
इन संकेतकों को 12 श्रेणियों में बांटा गया है, जिनमें जलवायु परिवर्तन शमन, वायु गुणवत्ता, वन, घासभूमि, मत्स्य पालन, वायु प्रदूषण, कृषि, जल संसाधन, स्वच्छता एवं पेयजल, भारी धातु, कचरा प्रबंधन तथा जैव विविधता एवं आवास शामिल हैं।
प्रत्येक संकेतक को लक्ष्य से दूरी के आधार पर शून्य से 100 के पैमाने पर अंक दिए जाते हैं। अंतिम सूचकांक अंक संकेतकों के औसत से निर्धारित किए जाते हैं। इसमें पर्यावरणीय स्वास्थ्य को 25 प्रतिशत, जलवायु परिवर्तन को 30 प्रतिशत और पारिस्थितिकी तंत्र की जीवनक्षमता को 45 प्रतिशत भार दिया गया है।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि भारत ने स्वच्छता, पेयजल, नवीकरणीय ऊर्जा और कृषि उत्पादकता जैसे क्षेत्रों में प्रगति की है। इसके बावजूद वायु प्रदूषण, कचरा प्रबंधन, अपशिष्ट जल उपचार, जैव विविधता संरक्षण, वन संरक्षण और भविष्य के उत्सर्जन जैसी चुनौतियां अभी भी गंभीर हैं।
पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक में भारत की स्थिति यह संकेत देती है कि आर्थिक और औद्योगिक विकास के साथ पर्यावरणीय स्थिरता को मजबूत करना अब बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। प्रदूषण नियंत्रण, स्वच्छ ऊर्जा, वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन, जल उपचार, प्राकृतिक आवासों का संरक्षण और टिकाऊ कृषि पद्धतियों पर प्रभावी कार्रवाई के बिना पर्यावरणीय प्रदर्शन में बड़ा सुधार हासिल करना कठिन होगा।
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