विश्व विरासत दिवस पर विशेष, हमारी विरासत हमारी धरोहर, हमारी पहचान

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आदिमानव का गढ़ रही हैं ऐतिकासिक आदमगढ़ की पहाड़ियां

106 वर्ष पूर्व 1920 में मनोरंजन घोष ने की थी शैलाश्रयों की खोज

बलराम शर्मा

आदमगढ़ की पहाड़ियां में बने चित्र चट्टानी आश्रय पाषाण काल तथा मध्यपाषाण काल के माने जाते हैं। यह पहाड़ियां आदि मानव का विशेष गढ़ रही है। तभी तो इसे आदमगढ़ की पहाड़िया कहा जाता है। इस पहाडिया पर मानव जाति के समूह में रहने के प्रमाण मिले हैं। यह पुरातत्व की धरोहर होने के साथ मानव के इतिहास से जुड़ी होने के कारण यह विरासत है। इतिहासकार के अनुसार यहां के शैलचित्र करीब 20 हजार वर्ष प्राचीन हैं। आदमगढ़ स्थित चित्रित शैलाश्रयों की खोज के 106 वर्ष पूरे हो गए है। इनकी खोज का श्रेय मनोरंजन घोष को जाता है जिन्होंने वर्ष 1920 में इनकी खोज की थी।

आदि मानवों द्वारा पहाड़िया पर आदमयुग के उत्कृष्ट शैलचित्र बनाए गए हैं जो उनकी रचना कौशल एवं श्रम साध्यता को प्रमाणित करते हैं। जो आज भी दिख रहे हैं। शैलायों की विषय वस्तु में पशु, बैल, हाथी, घोड़ा, सिंह, गाय, जिराफ, हिरण आदि तथा अश्वारोही योद्घा नर्तक की कृति बनी हुई है। ये चित्र उत्तर पाषाण युग से लेकर मध्यकाल तक के प्रतीत होते हैं। जो सफेद गहरे लाल हल्के गेरुआ और लाल रंग के चित्र हैं। आदमगढ़ की पहाड़ी पर 20 चट्टानी आश्रय में चित्रकारी की गई हैं जो लगभग 4 किमी के दायरे में फैले हुए हैं।

आदमगढ़ की पहाड़ी पर बने शैलचित्र जो हजारों साल पहले आदी मानव ने नुकीले पत्थरों की कारीगरी अमिट स्याही से पत्थरों पर उस जमाने की आकृति को उकेरा है।

1960 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने आरवी जोशी एवं एमडी खरे के मार्गदर्शन मे पुरातात्विक उत्खनन करवाया था, जिसमें लाखों वर्ष प्राचीन आदि मानव के पाषाण उपकरण प्राप्त हुए थे। वर्तमान में यह स्थल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, भोपाल मंडल के अंतर्गत संरक्षित राष्ट्रीय महत्व कि पुरातात्विक स्थल घोषित किया है। अर्थात यह एक विशेष विरासत के रूप में शासनाधीन है दूसरी एक और बात है कि यहां पर दुर्लभ किस्म की अनेक वनस्पतियों का संरक्षित रहना भी अपने आप में एक अलग ही जैव विवधता का खजाना है।

नर्मदा महाविद्यालय में इतिहास की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ हंसा व्यास का मानना है कि आदमगढ़ की प्राचीन पहाड़ी प्रागैतिहासिक काल की है। उस समय के मानवों के द्वारा जो शैलचित्र उकेरे गए हैं वह हमारी सांस्कृतिक धरोहर के रूप में है। इनका संरक्षण आवश्यक है।

पुरातत्व के जानकार वरिष्ठ समाजसेवी गोपीकांत घोष का कहना है कि वास्तव में आदमगढ़ की पहाड़िया प्राचीन विरासत है। पुरातत्व विभाग के माध्यम से भारत सरकार एवं प्रदेश सरकार को इस विरासत को जन मानस से जोड़ने की दिशा में सार्थक पहल करना चाहिए।

सेठानी घाट नर्मदापुरम की आत्मा से कम नहींं

नर्मदापुरम की मुख्य पहचान मां नर्मदा से है। साथ ही समूचे नर्मदांचल ही नहीं पूरे विश्व में प्रसिद्ध सेठानी घाट का अपना एक अलग ही महत्व है। यह घाट पूरे भारत में सबसे बड़े घाटों में शुमार है। सेठानी घाट को नर्मदापुरम की आत्मा कहना अतिशयोक्ति नहीं है। 19 वीं शताब्दी में घाट का निर्माण समाजसेवी सेठानी बाई के द्वारा हुआ था इस कारण इसका नाम सेठानी घाट है। यह घाट करीब 135 साल पुराना है। इस घाट से अनेक घाट जुड़ते जा रहे हैं जिससे और अधिक आकर्षण होता जा रहा है। घाट के समीप ही दिव्यता लिए हुए दर्जनों देवालय हैं। क्षेत्र की मुख्य आस्था का केंद्र मां नर्मदा के पावन तट पर प्रतिदन सुबह शाम मंदिरों में अारती और घंटियां मन को आनंदित करती हैं। सेठानी घाट धार्मिक आस्था का केंद्र होने के साथ ऐतिहासिक महत्व, स्थापत्य सौंदर्य और आध्यात्मिक वातावरण के कारण पर्यटकों को भी आकर्षित करता है। सदियों से श्रद्धालुओं, साधु.संतों और यात्रियों की आस्था का साक्षी रहा है। यह सिर्फ एक धार्मिक स्थान ही नहीं बल्कि तीर्थ स्थान बन चुका है। मां नर्मदा का प्रकटोत्सव यहां का सबसे बड़ा धार्मक महोत्सव है। इसके अलावा वर्ष भर सेठानी घाट पर धार्मिक आयोजन होते रहते हैं। अमावस्या पूर्णिमा, संक्राति, सहित अन्य पर्वों पर सेठानी घाट पर मेला लग जाता है। नित्य आरती समिति द्वारा हर दिन शाम को मां नर्मदा की आरती व महाआरती समिति के द्वारा पूर्णिमा सहित अनेक पर्व त्यौंहारों के अवसर पर मां नर्मदा की महाआरती सेठानी घाट पर की जाती है। सेठानी घाट पर ही शताधिक वर्षों से शर्मा परिवार के सहयोग से रामलीला महोत्सव समिति के द्वारा रामलीला का आयोजन किया जाता है। श्रावण माह में ही सत्संग भवन में सत्संग होता है। सेठानी घाट के समीप ही नवान्ह पारायण, गीता जयंती महोत्सव, पं रामलाल शर्मा स्मृति समारोह, शिवार्चन समिति के द्वारा पूरे श्रावण माह में महारूद्राभिषेक के आयोजन, नव संवतसर के अवसर पर अखिल भारतीय कवि सम्मेलन, युवा दिवस, योग दिवस के आयोजन, रामनवमी, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, भगवान परशुराम प्रकटोत्सव के आयोजन, श्राद्ध पक्ष में सामूहिक श्राद्ध, श्रावणी उपाकर्म, देवीप्रतिमा व जवारे विसर्जन के साथ ही अनेक धार्मिक आयोजन का सिलसिला चलता रहता है। इतना ही नहीं चुनावों के समय फार्म भरने और जीतने के बाद जुलूश निकालकर नेतागण अपने समर्थकों के साथ सेठानी घाट पर ही पूजन अर्चन के लिए पहुंचते हैं। प्रशासनिक अधिकारी भी अपनी ज्वानिंग करने से पूर्व मां नर्मदा की पूजन के लिए सेठानी घाट पर पहुंचते हैं। पूर्व में साधु वासवाणी व्याख्यान माला का आयोजन होता था जिसमें देश के अनेक विद्वानों का आगमन होता रहा है।

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