पति की संदिग्ध मौत के बाद पत्नी ने पुलिस प्रशासन के साथ ही पीएम, रक्षा मंत्री से गहन जांच की लगाई थी गुहार

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अक्षय डाक्टरों के साथ वाहन में थे सवार, डाक्टरों ने नहीं कराया उचित उपचार, फिर भी ध्यान नहीं दे रही सरकार ??

नर्मदापुरम। स्व. अक्षय दीक्षित की संदिग्ध मृत्यु को लेकर शासन प्रशासन गंभीर नहीं रहा। परिजनों के द्वारा उचित जांच की मांग पर भी ध्यान नहीं दिया गया। पुलिस ने जांच के नाम पर मजाक किया है। जिसकी वाडी पूरी मिली उसका एक पैर पुलिस ने गायब कैंसे लिखा? जब बिसरा में एल्कोहल नहीं आया तब उसे नशे की हालत में वाहन चलाना क्यों बताया गया। इनता नहीं वाहन में वरिष्ठ डाक्टरों की मौजूदगी जिसमें एक तो सीएमएचओ स्वयं मौजूद थे तब उसे वाहन क्यों चलाने दिया गया? जब अन्य लोगों को उतनी चोट नहीं आई तब अपने साथी को एम्बूलेंस से अस्पताल पहुंचाने की चिंता क्यों नहीं की गई? ऐसे तमाम सवाल परिजनों के साथ ही शहरवासियों व शुभचिंतकों के मन में उठ रहे हैं। मौत को लेकर तरह तरह की शंकाएं हो रही हैं। जिसका जबान बेटा दर्दनाक हादसे में स्वर्गवासी हो गया हो, जिसका पति मासूम बेटे को छोड़कर दुनिया से चला गया हो। उस परिवार पर क्या गुजर रही होगी? इसकी चिंता समाज के प्रशासन के जबावदारों को करनी चाहिए थी। जब परिजन इतने गंभीर सदमें से कुछ समय बाद जैसे तैसे बाहर आए उन्होंने जांच के लिए जबावदार अधिकारियों को पत्राचार किया। आवेदन दिए। मृतक अक्षय की पत्नी ने जब पीएम और रक्षा मंत्री सहित अन्य को आवेदन रजिस्ट्री जांच से भेजे हैं तब तो सरकार में बैठे इन जबावदाराें को एक पीडित पत्नी की चिंता गंभीरता से करनी चाहिए। क्योंकि सरकार में बैठे लोग नारी शक्ति की बातें बहुत करते हैं। नारी को न्याय दिलाने की चिंता कौन करेेंगे?

मौत के बाद जो दस्तावेज सामने आए हैं। वह मृतक के परिजनों को उपलब्ध कराने में मदद की जानी चाहिए थी। तथा जांच को गंभीरता से लिया जाना चाहिए था। जिसने मौत के बाद एक पैर गायब लिखा है उसको उसकी इतनी गंभीर गलती के लिए कौन सबक सिखाएगा? सरकार एक पीडित परिवार की गुहार पर क्यों ध्यान नहीं दे रही है?

अक्षय के पिता समाजसेवी अरूण दीक्षित तथा उनके मित्रों ने दस्तावेजों का परीक्षण करके पत्रकार वार्ता में खुले शब्दों षडयंत्र की आशंका जताई है। क्योंकि जो बयान सामने आ रहे हैं। उनमें अनेक विसंगतियां समाहित हैं। पुलिस की जांच भी शंका के दायरे में है। जब परिवार ने जांच के लिए आवेदन दिया था उस पर जांच होना चाहिए थी। न कि मामले का खात्मा लगया जाना चाहिए था।

सीएमएओ डॉ दिनेश देहलवार,डॉ रोहित शर्मा व एक अन्य साथी के फिर से बयान लेकर कोई बड़ी जांच एजेंसी प्रदेश स्तर की हो उससे गहन जांच कराई जाना चाहिए। जिससे कि पीड़ित परिवार को न्याय मिल सके। यदि वास्तविक रूप से जांच होती तो इस पीडित परिवार को बीमा आदि का लाभ मिल सकता था। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। क्योंकि इस मामले में पुलिस और अक्षय के साथियों ने सही तरीके से सहयोग करने की बजाए उससे बचते रहे हैं।

समाज को भी आना चाहिए आगे

शहर के समाजसेवियों व अन्य जबावदारों को इस गंभीर मसले पर शासन प्रशासन के द्वारा की गई लापरवाही को लेकर जन आंदोलन करना चाहिए। क्योंकि एक पीडित परिवार की सुनवाई करने की बजाय उस मामले का खात्मा ही कर दिया गया। हालाकि श्री दीक्षित के साथियों के द्वारा भी इस मामले में आक्रोश जताया जा रहा है।

फिर से खोली जाए फाइन

यदि पुलिस ने खात्मा लगाकर फाइल बंद कर दी है तो पीडित परिवार की मांग पर उस फाइल को फिर से खुलवाई जाना चाहिए और समाज के वरिष्ठजनों की सलाह मसविरा लेकर सार्थक जांच एजेंसी तय होनी चाहिए। जिससे कि पीडित परिवार कुछ हद तक संतुष्ट हो सके। ऐसा नहीं किया जाना एक पीडित परिवार के साथ खुला अन्याय होगा।

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