जिले में नई नर्सरी बनाए जाने के लिए नही बनाया जाता है कोई नया प्लान
जंगल में मंगल करने के लिए पहुंचते हैं तथाकथित अधिकारी और उनके नाते रिश्तेदार
नर्मदापुरम। पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता व वातावरण को शुद्ध रखने के लिए वन विभाग हर वर्ष वन क्षेत्र में होने वाले वनो के विनाश की पूर्ति की कवायद कागजी तौर पर करता रहा है। जिले का वन क्षेत्र 900 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। हर वर्ष वनों में पौधे लगाने का कार्य बरसात में होता है। जिसके लिए विभाग पहले से तैयारी करता है। वन विगाग के जंगलों को हरा-भरा बनाए रखने के लिए तैयारी जरूरी है। लेकिन बीते दो वर्ष से विभाग लापरवाह बना हुआ है। जिन क्षेत्रों में आग, हवा से ज्यादा नुकसान हुआ है, पुराने हो चुके जर्जर पेड़ों के गिरने तथा बारिश के दौरान जड़ों के कमजोर होने से अनेक वृक्ष टूट कर या उखड़ कर विखर जाते हैें ऐसे बिगड़े वनों के विकास के लिए शासन स्तर से विभाग को हर वर्ष पौधे लगाने के लिए फंड दिया जाता है। वन विभाग उस फंड के माध्यम से नई नर्सरी तैयार कर या सीधे अन्य नर्सरी से पौधे लाकर नए पौधे लगाकर वना के विकास की चिंता करता है लेकिन बीते दो वर्ष से विभाग के पास बिगड़े बनों के विकास को लेकर कोई योजना ही नहीं है। पूर्व में नर्सरी को लेकर चिंता होती रही है। अब पौधे खरीद कर जंगलों में लगाने की कागजी कवायद की जाती है।
जंगलों में लगती रहती है आग
गर्मी के मौसम में वनों में आग लगना स्वाभिक रहता है क्योंकि पतझड होने के बाद सूखे हुए पत्तों में बांसों के आपस में घर्षण या किन्हीं अन्य कारणों से आग लग जाती है जो वन क्षेत्र में फैलती रहती है। ऐसे मौके पर विभाग के द्वारा मजदूरों से भी आग बुझाने का कार्य भी किया जाता है जिसमें भी मजदूरों के नाम पर लीपापोती की जाती है। उसके बाद तो वन आग के कारण बिगड़ जाते हैं उनके विकास के लिए विभाग को चिंता करनी होती है। जिससे कि जंगल में वृक्षों की भरपाई होती रहे।
कहां रहे सतपुड़ा के घने जंगल
राष्ट्रकवि भवानी दादा ने सतपुड़ा के घने जंगल पर कविता लिखकर सिद्ध कर दिया था कि सतपुड़ा में घने जंगल हुआ करते थे। लेकिन विभाग की करतूत के चलते घने जंगल नहीं रहे। उन जंगलों के पेड़ों की अवैध कटाई होने तथा आग लगने या प्राकृतिक कारणों से पेड कम होते गए जंगलों में पेड़ों की संख्या बढ़ने की बजाय कम होती गई।
जंगल में अधिकारियों का होता है मंगल
जंगल में विभाग के अधिकारियों तथा उनके लग्गे भग्गों का आगमन होता रहता है। जो जंगल में बने रेस्ट हाउसों में जंगल में मंगल करने के लिए पहुंचते हैं ऐसे विभागीय तथा उनके रिश्ते नातेदारों की खूब सेवा होती है। यहां तक कि वन्य प्राणी तक असुरक्षित हो जाते है।
ग्रीन इंडिया मिशन के नाम पर आए थे 1.80 करोड़
पूर्व वर्षो में शासन के द्वारा ग्रीन इंडिया मिशन के नाम पर बिगड़े वनो के विकास और पौधे रोपण के लिए 1.80 करोड़ रूपये आए थे। उसके बाद भी अन्य योजनाओं के लिए भी शासन विभाग को राशि पहुंचाता है लेकिन विभाग चुपके चुपके योजनाओं को पलीता लगाता रहता है।
विभाग को वन क्षेत्र के बाघों की संख्या ही नहीं मालुम
वन विभाग के अधिकारियों को उनके विभाग के जंगलों में कितने बाघ का मूमेंट है यही जानकारी नहीं है। जबकि अनेक क्षेत्रों में बाघ होने के संकेत मिलते रहते हैं। वनों के पास वाले ग्रामीण अंचलो में भी बाघों का विचरण होता रहता है। यह विभाग को भी जानकारी मिलती है। लेकिन कितने बाघों का मूमेंट है यह विभाग के पास जानकारी नहीं है।
वनोपज को लेकर भी कोई प्लान नहीं
वन विभाग के पास वनोपज को लेकर भी कोई प्लान नहीं है पूर्व में तेंदूपत्ता, महुआ आदि अनेक वनोपज सहित अन्य जड़ी बूटियों के व्यवसाय को लेकिर विभाग के अधिकारी प्लान बनाते थे लेकिन वर्तमान में विभाग के पास वनोपज को लेकर कोई प्लान नहीं है।







