7 मार्च से लग रहे हैं होलिकाष्टक, पलाश में भरपूर हैं आए हैं फूल

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-प्राकृतिक रंगों से रंग बनाने वालों को रहती है प्रतिक्षा हर तरफ छाई हुई है पुष्पों की प्राकृतिक लालिमा

रश्मि गौड़

नर्मदापुरम। हर वर्ष की तरह फागुन माह में पलाश में सुर्ख लाल रंग के फूल हर तरफ नजर आ रहे हैं। पलाश के फूल खिले हुए हैं। जिससे हर तरफ प्राकृतिक लालिमा छाई हुई है। बसंत में बहार आई हुई है। हिंदू पंचांग के अनुसार इस साल होलाष्टक की शुरुआत 7 मार्च शुक्रवार से हो रही है और समापन 13 मार्च 2025 दिन गुरुवार को होलिका दहन के साथ होगा।

होली 12 दिन ही शेष बचे हैं। 6 दिन बाद होलिकाष्टक शुरू हो जाएंगे। पलाश के पेड़ों में इस वर्ष कुछ दिन पूर्व से ही फूल आ रहे हैं। इससे पलाश के रंग से प्राकृतिक रंग बनाकर होली खेलने वालों को समय पर फूल की उपलब्धता हो रही है। शहर के गुरूकुल परिवार तथा अन्य लोग जो पलाश के फूलों से रंग बनाते हैं उन्हें इस बार होली से पूर्व ही पर्याप्त समय में फूल मिल रहे हैं। महाशिवरात्रि के अवसर पर तिलक सिंदूर में पलास के फूलों से महादेव के मंदिर को सजाया गया।

होली आने का संकेत देते हैं पलाश

पलाश के फूल होली आने का संदेश देते हैं। प्रकृति भी रंग बिरंगे फूलों से होली खेलती है। होली और पलाश के फूलों का एक अलग ही रिश्ता है। जानकार लोगों के अनुसार पलास के फूल के रंग से होेली खेलने से शारीरिक ऊर्जा मिलती है। इस बार पलाश में जमकर फूल आए हैं। जो प्रकृति प्रेमी को लुभा रहे हैं।

जंगल में बढ़ गई है शोभा

जंगल में पतझड़ से खाली होते पेड़ों के बीच पलाश के फूलों से रंगत बन बनी हुई है। इनके सुंदर केसरी फूल जंगल की शोभा बढ़ा रहे हैं। चाहे सतपुड़ाचंल हो या विंध्याचल के पर्वत हर तरफ पेड़ों पर फूल नजर आए हैं।

रंग बना कर खेतले हैं होली

पलाश के फूलों से कुछ लोग रंग बना कर होली खेलते आ रहे हैं। इनकी पत्तियों का इस्तेमाल गुलाल आदि बनाने के लिए भी होता है। गर्मियों की शुरुआत में पलाश की आभा जंगल भी शोभा होती है। बताया जाता है कि पलाश के रंग से प्रतिरोधात्मक क्षमता बढ़ती है इस कारण भी पलाश के रंग से होली खेली जाती है।

तापमान का असर

पलाश के पेड़ को लगातार 30 डिग्री तापमान मिलने पर फूल आते हैं। यह तापमान एक पखवाड़े से अधिक समय पूर्व से होता तो तब फूल आने लगते। ऐसा मौसम इस बार समय पर रहने से अच्छी मात्रा में फूल अा चुके हैं।

पलाश का फूल उत्तर प्रदेश और झारखण्ड का राज्य पुष्प है। पलास में वैसे तो तीन तरह के फूल आते हैं लेकिन ज्यादातर दो प्रकार के ही मिलते हैं।एक सुर्ख लाल, दूसरा सफेद तथा तीसरा पीला भी फूल आता है जो कम ही जगह देखने को मिलता है। लाल फूलों वाले पलाश का वैज्ञानिक नाम ब्यूटिया मोनोस्पर्मा है। सफेद पुष्पो वाले लता पलाश को औषधीय दृष्टिकोण से अधिक उपयोगी माना जाता है। वैज्ञानिक दस्तावेज़ों में दोनो ही प्रकार के लता पलाश का वर्णन मिलता है। पीले पुष्प का उपयोग तांत्रिक गति.विधियों में भी बहुतायत से किया जाता है। पलाश की पत्तियों का उपयोग वैवाहिक कार्यक्रमों मे मंडपाच्छादन के लिए और मेहमानों को भोजन कराने के लिए दोना पत्तल के रूप मेें बहुत प्रचलित था। यह गांव मे सस्ते इंधन का विकल्प है और जलाऊ लकड़ी के रूप मेें उपयोग होता है। पलाश के फूलों का रस तितली, मधुमक्खियों बंदरों के अलावा बच्चों को भी बहुत मधुर लगता है। इसके फूलों के गहने बच्चों को बहुत भाते हैं।

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