सर्वोच्च भावना से बनते हैं तीर्थंकर : मुनि श्री निर्णय सागर जी महाराज 

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धर्मात्मा के प्रति वैसा अनुराग रखना जैसा गोमाता अपने बछड़े से किया करतीं हैं 

सीहोर। संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से दीक्षित नवाचार आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य पाठशाला प्रेरक  108 मुनि श्री निर्णय सागर जी महाराज ससंघ श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर स्थित छावनी संत भवन में शीतकालीन वाचना प्रवास पर है। मुनि श्री निर्णय सागर जी महाराज ससंघ के सानिध्य में प्रातः श्री जी के अभिषेक शांति धारा नित्य नियम पूजा अर्चना धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कर श्रद्धालु धर्म लाभ अर्जित कर रहे हैं। तत्पश्चात धर्म सभा में मुनि श्री निर्णय सागर जी महाराज ने प्रवचन के दौरान श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहां कि  जो व्यक्ति संसार के सम्पूर्ण जीवों के प्रति सुखी स्वाध्याय की मंगल भावना करता है वह जीव ही तीर्थंकर बनने का सौभाग्य प्राप्त करता है। सौलह कारण भावनाओं से जीवों को तीर्थंकर बनने का सर्वोच्च पुण्य कर्म का आस्रव होता है तीर्थंकर वह व्यक्तित्व के धनी हुआ करतें हैं। जो तीनों लोकों को के स्वामीयो से प्रणम्य हुआ करतें हैं। यदि देखा जाए तो तों तीर्थंकर बनना कठिन भी नही है। जैसे मां अपने बालक की चिंता करती है उस का  स्वास्थ ,भोजन, स्नानादि से सब प्रकार से देख भाल करके सुखी देखना चाहती है। वैसे ही हम संसार के सभी छोटे बड़े जीवों के प्रति सदभावना रखें तो हम भी तीर्थंकर बन सकते हैं। गुण और गुणियों के प्रति विनय  नम्रता रखना विनय भावना है। अपनी शक्ति को न छिपाकर त्याग तपस्या करना त्याग तपस्या की भावना है। साधु जनों की विध्न बाधाओ को दूर करना साधु समाधी भावना है। उनकी सेवा करना वैया वृत्ति  भावना है। धर्मात्मा के प्रति वैसा अनुराग रखना जैसा गोमाता अपने बछड़े से किया करतीं हैं । गोमाता अपनी संतान से निःस्वार्थ प्रेम करतीं हैं वैसे ही हम भी धर्मात्मा से निःस्वार्थ प्रेम करें तो हम भी तीर्थंकर बन सकते हैं। मांसाहार का त्याग कराना ,नशा मुक्त समाज तैयार, प्रदुषण मुक्त नगर,देश के लिए प्रयास करना भी मार्ग प्रभावना होती है। इत्यादि सौलह भावनाओं से हर जीव तीर्थंकर बन सकता है। भगवान महावीर स्वामी के जीव ने शेर की पर्याय में मांस का त्याग करके तीर्थंकर बनने की नींव  तैयार की थी जो 10 भवो के बाद भारत देश के बिहार प्रांत के कुंडलपुर (नालंदा के निकट) से तीर्थंकर बनने मां त्रिसला राजा सिध्दार्थ के यहां जन्म लिया था। भारत देश कि भूमि मंदिर के समान है यहां श्री राम भगवान महावीर, हनुमानजी जैसे अनंता नन्ही जीवों ने जन्म लेकर भगवान पद को प्राप्त किया है। भारत वह देश है जहां सनातन काल से ऋषि मुनियों ने जन्म लिया है। वर्तमान समय में भी अनेकों अनेक साधु संत यहां मोजूद है। दोपहर में स्वाध्याय धार्मिक शिक्षण कक्षा में श्रद्धालु ज्ञानार्जन कर रहे हैं। संध्या को गुरु भक्ति श्रधदालुओ की जिज्ञासाओं का  समाधान।
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