सीहोर। दिगंबर जैन संत समाधिस्थ संत शिरोमणि आचार्य गुरुवर 108 श्री विद्यासागर सागर जी महाराज साहब से दिक्षित वर्तमान आचार्य 108 श्री समय सागर महाराज साहब के परम प्रभावक शिष्य पाठशाला प्रेरक मुनि श्री निर्णय सागर जी महाराज ने श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर मे धर्म सभा मे प्रवचन के दौरान श्रावक श्राविकाओ को संबोधित करते हुए प्रकृति की अमूल्य देन के महत्व को समझाते हुए कहा कि संसार की समस्त वस्तुएं बड़े पुण्य से प्राप्त होती है। हम इनका मूल्य नहीं समझते हैं दिन रात दिन रात इनको बर्बाद करते रहते हैं । इनकी बर्बादी से पाप कर्म का बंध तो होता ही है। परन्तु प्रकृति का संतुलन भी नष्ट होता है। आज कलयुग है फिर भी प्रकृति में मिट्टी है, पानी है ,हवा है ,अग्नि, बिजली है । वनस्पति के रूप में पेड़ पौधे हैं। इनका हमको हमेशा ध्यान रखना चाहिए । इनमें भी जीव होते हैं इन्हें भी कष्ट होता है। इनको जितनी आवश्यकता है उतना ही उपयोग करो में आवश्यकता उपयोग करने में अल्पमत पाप होगा। जब कि अनावश्यक बर्बाद करने से भयंकर पाप होगा। मतलब आवश्यक में सरसों के दाने बराबर वह अनावश्यक में पर्वत अर्थात पहाड़ बराबर पाप लगेगा आज मानव अपने स्वार्थ के लिए पहाड़ काट रहा है पानी को बांध बनाकर प्रकृति का संतुलन बिगड़ा रहा है । मुनि श्री ने कहा कि प्रकृति की अमूल्य देन को अनावश्यक बर्बाद करने से दुस परिणाम पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जिससे भकंप सुनामी लहर आंधी तूफान आदि भयंकर आपदाएं देखी जा रही है कोरोना जैसी महामारीया फैल रही है ।पानी का उपयोग घी की तरह क्यों नहीं करते हो। घी को मूल्यवान समझते हो पानी उसे भी मूल्यवान है घी के बिना जीवन चल सकता है पानी के बिना कदापि नहीं । कूलर चलाते हैं एक कूलर में दिन भर में 200 लीटर पानी खर्च होता है जरूरी नहीं घर के हर कमरे में कूलर चले एक व्यक्ति के लिए जीवन चलाने में एक दिन में 10 लीटर पानी लगता है आपने यदि 200 लीटर पानी बर्बाद किया तो समझना 20 लोगों को प्यासा रखने का पाप संग्रह कर लिया । एयर कंडीशन और भी खतरनाक है क्योंकि हवा की ऑक्सीजन काम करता है। हवा के बिना जीवन संभव नहीं है। अतएव प्रकृति को समझो इसको सहेज कर रखो वरना भविष्य ही खतरे में हो जाएगा ।








