22 साल पुराने विधायी विशेषाधिकार मामले को सुप्रीम कोर्ट ने किया समाप्त

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तमिलनाडु विधानसभा ने 2003 का विवादित प्रस्ताव 2004 में ही वापस ले लिया था
नई दिल्ली (आरएनएस)। सुप्रीम कोर्ट की सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने विधायी विशेषाधिकारों की संवैधानिक सीमाओं से जुड़े करीब 22 साल पुराने संदर्भ को निष्फल मानते हुए सोमवार को कार्यवाही समाप्त कर दी। पीठ ने पाया कि तमिलनाडु विधानसभा ने वर्ष 2003 में पारित वह प्रस्ताव 2004 में ही वापस ले लिया था, जिसके कारण यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और बाद में इसे सात न्यायाधीशों की पीठ के विचार के लिए भेजा गया था। इसके चलते विधायी विशेषाधिकार और नागरिकों के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के बीच संतुलन से जुड़े महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्नों पर इस मामले में फैसला देने की आवश्यकता नहीं रह गई।
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने की। पीठ में न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची, न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली, न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे।
पीठ ने अपने आदेश में कहा कि तमिलनाडु विधानसभा के सचिव की ओर से अगस्त 2004 में दाखिल हलफनामे में 13 जुलाई 2004 को पारित प्रस्ताव का उल्लेख किया गया था। इस प्रस्ताव के माध्यम से विधानसभा ने नवंबर 2003 में पारित अपने पूर्व प्रस्ताव को वापस ले लिया था। अदालत के अनुसार, यह महत्वपूर्ण तथ्य उस समय स्पष्ट रूप से उसके संज्ञान में नहीं आ सका था, जब मामले को सात न्यायाधीशों की पीठ के पास भेजा गया था।
सुनवाई के दौरान भारत सरकार और कुछ राज्यों की ओर से महान्यायवादी आर. वेंकटरमणी तथा सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखा। वहीं तमिलनाडु विधानसभा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन पेश हुए।
पीठ ने कहा कि सभी पक्ष इस बात पर सहमत हैं कि तमिलनाडु विधानसभा द्वारा मूल प्रस्ताव वापस लिए जाने के बाद वर्तमान मामले में निर्णय के लिए कोई प्रभावी विवाद शेष नहीं है। याचिकाकर्ताओं की ओर से हालांकि आग्रह किया गया कि मामले से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी और संवैधानिक प्रश्नों को भविष्य में किसी उपयुक्त मामले में विचार के लिए खुला रखा जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने इस सुझाव को स्वीकार करते हुए कहा कि महत्वपूर्ण विधिक प्रश्नों पर भविष्य में उचित मामले में निर्णय लिया जा सकता है। अदालत ने मौजूदा रिट याचिकाओं को निष्फल मानकर उनका निपटारा कर दिया, लेकिन संबंधित कानूनी प्रश्नों को भविष्य की उचित कार्यवाही में निर्णय के लिए खुला रखा।
यह मामला वर्ष 2003 में तमिलनाडु विधानसभा की ओर से ‘द हिंदू’ समाचार पत्र के पत्रकारों के खिलाफ की गई कार्रवाई से जुड़ा था। विधानसभा ने तत्कालीन राज्य सरकार और तत्कालीन मुख्यमंत्री जे. जयललिता की आलोचना करने वाली खबरों और संपादकीय के प्रकाशन को विशेषाधिकार का उल्लंघन माना था।
इसके बाद विधानसभा ने तत्कालीन संपादक एन. रवि, कार्यकारी संपादक मालिनी पार्थसारथी, ब्यूरो प्रमुख वी. जयंत, विशेष संवाददाता राधा वेंकटेशन और प्रकाशक एस. रंगराजन को विशेषाधिकार उल्लंघन के मामले में 15 दिन के साधारण कारावास की सजा सुनाई थी। उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट भी जारी किए गए थे। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इन वारंटों पर रोक लगा दी थी।
मामले को बाद में सात न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष इस उद्देश्य से भेजा गया था कि विधायी विशेषाधिकारों की संवैधानिक सीमा और उनके इस्तेमाल के दौरान नागरिकों के मौलिक अधिकारों, विशेषकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, की सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों पर विचार किया जा सके।
हालांकि, विधानसभा द्वारा अपना मूल प्रस्ताव वापस लिए जाने के तथ्य के सामने आने के बाद पीठ ने माना कि मौजूदा विवाद निष्फल हो चुका है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इससे संबंधित महत्वपूर्ण संवैधानिक और कानूनी प्रश्नों का अंतिम निर्धारण नहीं हुआ है। ऐसे प्रश्न भविष्य में किसी वास्तविक और प्रभावी विवाद के सामने आने पर उचित मामले में विचार के लिए खुले रहेंगे।
इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने करीब दो दशक से अधिक समय से लंबित इस कार्यवाही को समाप्त कर दिया, लेकिन विधायी विशेषाधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संवैधानिक संतुलन से जुड़े व्यापक प्रश्नों पर भविष्य में न्यायिक परीक्षण की संभावना बरकरार रखी है।
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