नई दिल्ली,(आरएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को दिल्ली पुलिस से इंडियन मुजाहिदीन के दो कथित सदस्यों की जमानत याचिका पर जवाब मांगा – जो 12 साल से ज्यादा वक्त जेल में बिता चुके हैं. यह मामला दिल्ली में एक कथित गैर-कानूनी हथियार और गोला-बारूद फैक्ट्री से संबंधित एक आतंकी साजिश से जुड़ा है.यह मामला जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया. सुप्रीम कोर्ट ने मोहम्मद साकिब अंसारी और वकार अजहर की याचिकाओं पर नोटिस जारी किया. याचिकाकर्ताओं की तरफ से वकील दीक्षा द्विवेदी, पारस नाथ सिंह और फहद खान ने पैरवी की.सुनवाई के दौरान, दिल्ली पुलिस के वकील ने कहा कि हाई कोर्ट ने जमानत देने से मना करते हुए एक सोच-समझकर आदेश दिया था और गुलफिशा फातिमा फैसले में बताए गए सिद्धांतों को लागू किया था. लेकिन, सुप्रीम कोर्ट इस बात से सहमत नहीं दिखा. पीठ ने पूछा, क्या वजह है? जिस फैसले की बात हो रही है, वह संदर्भ के लिए लंबित है.पीठ ने मौखिक रूप से कहा कि के.ए. नजीब निर्णय (2021), (जिसमें कहा गया था कि ट्रायल में देरी यूएपीए मामलों में जमानत देने का एक वैध आधार है) यहां पूरी ताकत से लागू होगा, बशर्ते कि गुलफिशा मामले (उमर खालिद का मामला) में इसकी व्याख्या कैसे की गई हो. पीठ ने वकील से कहा कि उन्हें एक जवाबी हलफनामा दायर करना होगा.गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत दर्ज मामलों में जमानत से जुड़े कानूनी सिद्धांत पर अभी सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ विचार कर रही है.याचिकाकर्ताओं को 2014 में गिरफ्तार किया गया था और बाद में 2021 में राजस्थान में अलग-अलग केस में उन्हें देश के खिलाफ जंग छेडऩे और यूएपीए और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत उल्लंघन के लिए दोषी ठहराया गया था. अप्रैल 2026 में, दिल्ली हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय राजधानी में आतंकी हमले की साजिश में कथित तौर पर शामिल दोनों आरोपियों को जमानत देने से मना कर दिया था।
हाई कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक जेल में रहना, गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, 1967 के कड़े नियमों के तहत राहत पाने का अकेला आधार नहीं हो सकता, खासकर तब जब रिकॉर्ड में मौजूद सबूत लगातार खतरे का इशारा करते हों.
22 मई को सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के दिल्ली दंगों के मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार करने वाले पहले के फैसले के सही होने पर हाल ही में उठाए गए सवालों को एक बड़ी पीठ को भेज दिया.








