राफेल को बड़ा झटका, इस देश ने लास्ट मिनट में रद्द की 29,000 करोड़ की डील, जानें क्या रही वजह

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नई दिल्ली (आरएनएस)। भारत और फ्रांस के बीच संभावित राफेल सौदे पर चर्चा तेज है। भारत लगभग 3.25 लाख करोड़ रुपये की लागत से फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह सौदे की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी चर्चा हो रही है। राफेल की तकनीकी क्षमताओं और अमेरिकी एफ-35 फाइटर जेट से उसकी तुलना भी लगातार की जा रही है। इसी बीच राफेल से जुड़ी एक नकारात्मक खबर सामने आई है, जिसमें फ्रांस की कंपनी दसॉल्ट एविएशन को एक बड़े अंतरराष्ट्रीय सौदे से हाथ धोना पड़ा है।
दरअसल, दसॉल्ट को उम्मीद थी कि दक्षिण अमेरिकी देश कोलंबिया अपनी वायुसेना के लिए राफेल लड़ाकू विमानों का चयन करेगा। कोलंबिया पुराने हो चुके फाइटर जेट्स को बदलने की योजना पर काम कर रहा था और वहां के सैन्य अधिकारियों ने राफेल की क्षमताओं की खुलकर सराहना भी की थी। बताया जाता है कि दोनों पक्षों के बीच लगभग 2.96 बिलियन पाउंड, यानी करीब 27 हजार करोड़ रुपये की डील लगभग तय मानी जा रही थी और कागजी औपचारिकताएं भी काफी हद तक पूरी हो चुकी थीं। यदि यह सौदा होता, तो राफेल वहां इजरायली किर्फिर जेट्स की जगह लेता। हालांकि, अंतिम समय पर कोलंबिया सरकार ने राफेल की बजाय स्वीडन के ग्रिपेन लड़ाकू विमान को चुन लिया। आधिकारिक तौर पर राफेल को सौदा न मिलने के पीछे कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया है।ड्ढद्बह्यद्धशश्चह्यह्लह्म्श2.ष्शद्व की एक रिपोर्ट के अनुसार, स्वीडन की कंपनी ने कोलंबिया को कई आकर्षक प्रस्ताव दिए थे। इनमें लंबे समय तक औद्योगिक सहयोग, तकनीक हस्तांतरण, स्थानीय स्तर पर असेंबली की संभावना, कम परिचालन लागत और रखरखाव से जुड़े वादे शामिल थे।ग्रिपेन को मध्यम आकार की वायुसेनाओं के लिए एक किफायती और आधुनिक लड़ाकू विमान के तौर पर पेश किया जाता है। यह अपेक्षाकृत हल्का और अधिक लचीला है, साथ ही राफेल और यूरोफाइटर टाइफून जैसे विमानों की तुलना में इसका संचालन खर्च भी कम बताया जाता है। कोलंबिया को यह भी लगा कि ग्रिपेन सौदे के जरिए वह अपने देश में फाइटर जेट निर्माण से जुड़ा एक इकोसिस्टम विकसित कर सकता है। इससे यह साफ होता है कि लड़ाकू विमान खरीदते समय केवल उनकी क्षमताएं ही नहीं, बल्कि उनके दीर्घकालिक संचालन और रखरखाव की लागत भी अहम भूमिका निभाती है।
कोलंबिया से झटका मिलने के बाद यह सवाल जरूर उठता है कि क्या राफेल की लोकप्रियता में कमी आ रही है। इससे पहले 2021 में भी फ्रांस को ऑस्ट्रेलिया के साथ सबमरीन डील में नुकसान उठाना पड़ा था, जब ऑस्ट्रेलिया ने अमेरिका और ब्रिटेन को प्राथमिकता दी थी। हालांकि, इन घटनाओं के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि राफेल की चमक फीकी पड़ रही है। राफेल को यूरोप से बाहर कई नए ग्राहक मिले हैं, जिनमें भारत सबसे प्रमुख है।
वर्तमान में राफेल का ऑर्डर बुक मजबूत स्थिति में है। अब तक करीब 300 राफेल विमान तैयार किए जा चुके हैं, जो फ्रांसीसी वायुसेना की ताकत का अहम हिस्सा हैं। फ्रांस के पास इस समय 234 राफेल विमान सेवा में हैं और लगभग 273 नए विमानों के ऑर्डर लंबित हैं। राफेल खरीदने वाले देशों में भारत, कतर, ग्रीस, क्रोएशिया और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं।
भारत अब तक फ्रांस से वायुसेना के लिए 36 राफेल और नौसेना के लिए 26 मरीन राफेल खरीद चुका है। इसके अलावा भारत 114 नए राफेल विमानों की एक और बड़ी डील की तैयारी में है, जिसकी अनुमानित लागत करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये है। यदि यह सौदा अंतिम रूप लेता है, तो फ्रांस के बाद भारत सबसे ज्यादा राफेल विमानों का संचालन करने वाला देश बन जाएगा।
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