मैया संग कन्हैया ने विमान में विराजमान होकर किया नगर भ्रमण

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नर्मदा नगरी में गूंजा हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की का जयघोष
नर्मदापुरम। नर्मदा नगरों में डोल ग्यारस का पर्व परंपरागतरूप से भक्ति भाव के साथ मनाया गया। भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की पदमा एकादशी जिसे डोल ग्यारस भी कहा जाता है। इस मौके पर बुधवार को शहर के करीब दो दर्जन मंदिरों से विमान निकले। नर्मदा तट के श्री बद्रीनाथ धाम मंदिर में भगवान के श्री विग्रह का विशेष श्रृंगार किया गया। भगवान श्री बालकृष्ण ने अपनी मैया जशोदा जी के साथ विमान में बैठकर नगर भ्रमण किया। इस दौरान शहर के मुख्य मार्ग जहां से विमान निकल रहे थे उस तरफ से हाथी घोडा पालकी जय कन्हैया लाल की का जय घोष हो रहा था।
शहर में मुख्य मार्ग से निकले विमान
विमान में बैठे भगवान इस दौरान घाट पूजन के बाद वापस मंदिर प्रांगण में पहुंचे। नगर के श्री बद्रीनाथ धाम मंदिर, श्री राम जानकी मंदिर, श्री रणछोड़ माँदर, श्री कनक बिहारी माँदर, श्री राम मंदिर राजघाट, श्री सत्यनारायण मंदिर, राम जानकी मंदिर आदमगढ़, सहित नगर के विभिन्न क्षेत्रों से विमान सेठानी घाट पर पूजन के बाद यथा स्थान वापस हुए।
डोल की प्राचीन मान्यता
आचार्य पं अविलाष शर्मा ने बताया कि डोल ग्यारस के अवसर पर विमान निकालने की मान्यता है कि भगवान कृष्ण के जन्म के पश्चात माता यशोदा घाट पूजन करने जाती हैं इसी उपलक्ष में भगवान के विमान को निकाला जाता है पंडित शर्मा ने बताया कि आज ही के दिन भगवान श्री हरि विष्णु शयन काल के दौरान करवट बदलते हैं इसलिए इस एकादशी को पाश्र्व परिवर्तिनी एकादशी कहते हैं।
इसलिए मनाते हैं डोल ग्यारस
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी को डोलं ग्यारस का उत्सव मनाया जाता है। मान्यताओं के अनुसार इस दिन कृष्ण के जन्म के अठारह दिन बाद यशोदा जी ने जात पूजन किया था। उनके सम्पूर्ण कपड़ों का प्रक्षालन किया था। उसी के अनुसरण में ये डोल ग्यारस का त्योहार मनाया जाता है। इसी कारण इस एकादशी को जाल झूलनी एकादशी भी कहते हैं। इस
एकादशी में चन्द्रमा अपनी ग्यारह कलाओं में उदित होता है। इस पद्मा एकादशी को व्रत रखा जाता है। किवदंती है की इस दिन विष्णु भगवान शयन करते हुए करवट बदलते हैं इस कारण से इस एकादशी को परिवर्तनी एकादशी भी कहते हैं। ऐसा माना जाता है की भगवान विष्णु हर चातुमांस को अपना बलि को दिया हुआ वचन निभाने के लिए पाताल में निवास करते हैं।
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