पुत्र की दीर्घायु के लिए महिलाएं रखेंगी व्रत
रश्मि गौड़ शर्मा,
नर्मदापुरम। भोपाल। प्राचीन मान्यताओं के चलते भादों मास की कृष्ण पक्ष की षस्ठि तिथि को आज गुरूवार को पुत्रवती महिलाएं हरछट माता की पूजन करेंगी। हरछठ पूजा का यह त्योहार भादों कृष्ण पक्ष की छठ को मनाया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म हुआ था। यह व्रत केवल पुत्रवती महिलाएं करती हैंं। इस व्रत में पेड़ों के फल बिना बोया अनाज आदि के सेवन का विधान है। इस व्रत की यह विशेषता है कि इसमें भैंस का दूध ही लिया जाता है। पुत्रों की दीर्घायु और उनकी सम्पन्नता के लिए महिलाएं कठिन व्रत करती हैं। इस व्रत में महिलाएं अपने पुत्रों के हिसाब से छह दोने में सतबिर्री अर्थात सात भुने हुए अनाज का भोग लगाती हैं। पूजन के लिए छोटी कांटेदार झाड़ी की एक शाखा, पलाश की एक शाखा एक प्रकार की लता, की एक शाखा को भूमि या किसी मिटटी के गमले में गाड़ कर पूजन किया जाता है। महिलाएं पड़िया वाली भैंस के दूध से बने दही और महुवा के सूखे फूल, को पलाश के पत्ते पर खाकर व्रत का समापन करतीं हैं।
इस व्रत के संबंध में श्रीमती रश्मि शर्मा और राधा रावत ने बताया कि भगवान बलराम ने माता देवकी और वासुदेव जी के यहां पर सातवी संतान के रूप में जन्म लिया था। हल षष्ठी का त्योहार भगवान बलराम की जयंती के रूप में मनाया जाता है। रक्षा बंधन और श्रावण पूर्णिमा के छह दिनों के बाद बलराम जन्मोत्सव मनाया जाता है। इसे राजस्थान जैसे अन्य राज्यों में विभिन्न नामों से जाना जाता है। इसे गुजरात में चंद्र षष्ठी के रूप में जाना जाता है, और ब्रज क्षेत्र में बलदेव छठ को रंधन छठ के रूप में जाना जाता है। भगवान बलराम को शेषनाग के अवतार के रूप में पूजा जाता है, जो क्षीर सागर में भगवान विष्णु के हमेशा साथ रहिने वाली शैया के रूप में जाने जाते हैं।
श्रीमती राधा रावत ने बताया कि जिन महिलाओं के पुत्र हेैं वहीं महिलाएं इस व्रत को करती है। अपनी दीवाल में हरछट माता की आक्रति बनाकर उसके नीचे बैर की झाडि़यों या कांस के पौधे रखे जाते हैं। वहीं सात प्रकार के अनाज को भून कर भोग लगाया जाता है। इससे पुत्र की दीर्घायु होती है।






