तीनों बांध से झोड़ा जा रहा है पानी, बाढ़ से बचाव की जरूरी है सावधानी
बलरााम शर्मा
नर्मदापुरम। मां नर्मदा के तट पर 1973 और 1999 में खतरनाक बाढ़ आ चुकी है। जिसे अनेक लोगों ने देखा है। और भोगा है। यदि फिर से ऐसी ही पुनरावृत्ति होती है। तो दोषी काैन होगा। क्या लाखों लाेगों की जिंदगी की सुरक्षा के लिए सार्थक कदम नहीं उठाए जाने चाहिए। कुछ वर्ष पूर्व उतराखंड की त्रासदी को भी देखा है। प्रकृति से खिलवाड़ का नतीजा सामने आता रहता है। इसलिए समय रहते सावधान रहना चाहिए। लेकिन नर्मदा तट के नर्मदापुरम में ऐसा नहीं किया गया है। बड़ी संख्या में नर्मदा तट पर खतरनाक स्थिति में आवास बने हुए हैं। शासन में बैठे जनप्रतिनिधियों की उदासीनता और प्रशासन में बैठे जबावदार तथाकथित अफसरों की लापरवाही के कारण नर्मदा तट के जल संग्रहण क्षेत्र में लगातार मनमाने तरीके से निर्माण होते रहे हैं। जिससे बाढ़ के समय खतरा बढ़ने की संभावना बनी रहती है। 1973 और 99 से भी बड़ी बाढ़ की पुनर्रावृत्ति हुई तो क्या होगा? वर्तमान में तीनों बांध से पानी छोड़ा जा रहा है। लगातार तेज बारिश के कारण बांधों से पानी छोड़ा जाना मजबूरी भी होता है। तभी खतरनाक स्थिति बनती है।
जरूरी सावधानियों पर नहीं दिया जाता ध्यान
मां नर्मदा के तट पर बेजा अतिक्रमण किए गए हैं। नर्मदा तट के पेड़ों की अंधाधुंध कटाई की गई। नर्मदा तट पर अवैध रूप से खनन किया जा रहा है। नर्मदा के जल की लूट मचाई जा रही है। सावधानी के नाम पर आपदा के नाम पर ज्यादा कुछ तैयारी नहीं हो सकी है। यदि फिर से खतरनाक बाढ़ आ गई तो भगवान व मां नर्मदा ही मालिक है। क्योंकि तथाकथित जबावदारों ने वैसा कुछ नहीं किया जो करना चाहिए था।
उच्च न्यायालय ने भी चेताया था
पूर्व में उच्च न्यायालय को नर्मदा मिशन ने अवगत कराया है। उसी आधार पर उच्च न्यायालय ने जो उच्चतम बाढ़ के 300 मीटर के दायरे को आधार बिंदु बनाया है। उस दायरे के अंदर किसी को निर्माण की अनुमति नहीं दी जाना चाहिए लेकिन उसके बाद कई आवास बन गए। बनते जा रहे हैं। शासन कृत्रिम रूप से बांध बना कर जल संग्रहण करने के लिए विस्थापन कर सकता है। तब जो लोग खतरे के स्थान पर हैं उनका विस्थापन भी तो हो सकता है। लेकिन ऐसा नहीं है। अधिकारी आते हैं समय काट कर चले जाते हैं।
1973 में हुआ था विस्थापन
मां नर्मदा की प्रलंयकारी बाढ़ 1973 में आई थी उस दौरान नर्मदा तट के अनेक गांवाें को नीचे से ऊपर बसाने के लिए जगह उपलब्ध कराई गई थी। शहर में भी बाढ़ पीडित कालोनी के नाम से जगह दी गई है। उसके बाद फिर अनेक लोग उसी खतरे वाली जगह पर बस गए उनका विस्थापन क्यों नहीं किया जा रहा है।
29 अगस्त 1973 को फूट गई थी पिचिन
शासकीय ग्रह विज्ञान महाविद्यालय के पास बनी पिचिन के टूटने से शहर के कई हिस्सों में पानी पहुंच गया था। देखते ही देखते पूरे शहर में पानी भर गया था। कई मकान भी धराशायी हो गए थे। मूसलाधार बरसात में जनजीवन पूरी तरह से अस्त.व्यस्त हो गया था। बच्चे, महिलाएं सभी अपनी जीवन रक्षा के लिए सुरक्षित स्थानों की ओर भाग रहे थे। उस समय रात में अचानक आई थी बाढ़।






