पानी की उपलब्धता हो तो हरी खाद की फसलें बोएं, मृदा के स्वास्थ्य में सुधार करें

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सीहोर/कृषि वैज्ञानिक के अनुसार खेती में हरी खाद उस सहायक फसल को कहते हैं जिसकी खेती मुख्यतः भूमि में पोषक तत्वों को बढ़ाने एवं जैविक पदार्थ की पूर्ति करने के लिए की जाती है। ऐसी फसल को फूल आने से पहले कल्टीवेटर चलाकर मिट्टी में मिला दिया जाता है। हरी खाद से लाभ हरी खाद के उपयोग से मृदा में नाइट्रोजन व कार्बनिक पदार्थ की पूर्ति होती है। मृदा संरचना में सुधार, वायु संचार एवं जलधारण क्षमता में वृद्धि होती है। मृदा में सूक्ष्म जीवों की संख्या व क्रियाशीलता बढ़ती है। कृषि वैज्ञानिक के अनुसार हरी खाद की फसलें हरी खाद के लिए दलहनी फसल सनई, ढेंचा, लोबिया, मूंग, उड़द ज्वार आदि फसलों का उपयोग करें। इन फसलों की जल मांग व उर्वरक की आवश्यकता कम होती है, जिससे कम लागत में अधिक कार्बनिक पदार्थ मिलता है। दलहनी फसलों की जड़ों में नाइट्रोजन को वातावरण से मृदा में स्थिर करने वाले जीवाणु राइजोबियम पाए जाते हैं। सनई, ढेंचा फसल की बुवाई के लिए बीज दर 40 से 50 किग्रा प्रति हैक्टेयर एवं मूंग, उड़द की बुवाई के लिए बीज दर 20 से 25 किग्रा प्रति हैक्टेयर की दर से उपयोग करें।  कृषि वैज्ञानिक के अनुसार हरी खाद की फसल लेने की विधियां… पानी की व्यवस्था होने पर मई के अंतिम सप्ताह में हरी खाद की फसलों की बुवाई करें या मानसून आने पर बोएं। बुवाई के 30 से 35 दिन बाद फूल आने से पहले खेत में पाटा लगाकर या कल्टीवेटर लगाकर हरी खाद की फसल को खेत में मिला दें। इस दौरान ध्यान रखें कि हरी खाद की फसल 15 से 20 सेंटीमीटर की गहराई पर पलटे। समय से पहले पलटने से पर्याप्त कार्बनिक पदार्थ नहीं मिलते एवं देर से पलटने से रेशा अधिक होने से फसल को सड़ने-गलने में अधिक समय लगता है। अधिक वर्षा तथा अधिक तापक्रम की दशा में सड़ने- गलने की प्रक्रिया शीघ्र आरंभ हो जाती है। धान की खेती करने वाले क्षेत्रों में सनई, ढेंचा की फसल को उगाकर व खेत को पलटकर एवं मचाई कर धान की रोपाई आसानी से की जा सकती है। हरी खाद की दलहनी फसलों से 20 से 25 किलो नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर तथा गैर दलहनी फसलों में 40 से 50 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर की बुवाई के समय दर से डालने से अधिक लाभ होता है। कृषि वैज्ञानिक के अनुसार हरी खाद के उपयोग से मृदा की भौतिक, रासायनिक व जैविक दशा में सुधार होता है, जिससे खेतीकी लागत में कमी आती है। दलहनी फसलसनई ढेंचा, लोबिया, मूंग, उड़द ज्वार आदि फसलोंकीवृद्धिकम समय में हो जाती है। फसलों में पत्तियां बड़ी, वजनदार व बहुत संक्ष्या में रहती है।

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