नृसिंह कवच और विष्णु सहस्रनाम का पाठ किया

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 आज किया जाएगा वैशाख पूर्णिमा पर कन्याओं का पूजन
सीहोर।  शहर के सीवन तट पर हनुमान मंदिर गोपालधाम में शिव प्रदोष सेवा समिति के तत्वाधान में एक माह तक आयोजित होने वाले शिव शक्ति दिव्य अनुष्ठान वैशाख महापर्व का आयोजन किया जा रहा है। महापर्व के अंतर्गत रविवार को नृसिंह जन्मोत्सव के अवसर पर यहां पर उपस्थित श्रद्धालुओं ने भगवान विष्णु के सहस्त्रनाम के पाठ के साथ नृसिंह कवच का आयोजन किया। सुबह भगवान शिव का विशेष अभिषेक किया गया था और उसके पश्चात हवन में आहुतियां दी। वहीं देर रात्रि को भगवान नृसिंह की 21 दीप प्रज्जवलित कर आरती की जाएगी। इस मौके पर यज्ञाचार्य पंडित पवन व्यास, पंडित कुणाल व्यास के मार्गदर्शन में विप्रजनों और श्रद्धालुओं ने आरती की। वहीं सोमवार को यहां पर जारी 30 दिवसीय वैशाख महापर्व का समापन किया जाएगा। इस दौरान कन्याओं का पूजन के साथ प्रसादी का वितरण किया जाएगा।
रविवार को समिति की मनोज दीक्षित मामा ने बताया कि भगवान विष्णु ने अपने अवतार नृसिंह रूप में प्रकट होकर भक्त प्रह्लाद की रक्षा की थी और हिरण्यकश्यप का वध किया था। भगवान नृसिंह का अवतार विष्णु के अवतरों में अत्यंत प्रभावशाली और रौद्र रूप माना जाता है। वे आधे मनुष्य और आधे सिंह के स्वरूप में प्रकट हुए थे। उनका यह रूप दर्शाता है कि जब भक्त की परीक्षा कठिनतम स्थिति में होती है, तब भगवान स्वयं आकर उसकी रक्षा करते हैं। नृसिंह जन्मोत्सव पर भगवान विष्णु के इस रूप की उपासना करने से भय, क्रोध, रोग, बाधाएं और शत्रु नष्ट होते हैं। यह दिन विशेष रूप से भक्तों की रक्षा, शक्ति, साहस और सत्य के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है। नृसिंह जयंती की पूजा सांयकाल के समय करने का विधान है। पूजा में शुद्ध घी का दीपक जलाया जाता है और पंचामृत से दैत्यसूदन भगवान नृसिंह को स्नान कराया जाता है। फिर वस्त्र, फूल, चंदन, धूप, दीप, नैवेद्य आदि अर्पित किए जाते हैं। भगवान नृसिंह के मंत्र ऊं नरसिंहाय वरप्रदाय नम मंत्र का जाप करें। इस दिन जरूरतमंद लोगों को गर्मी से राहत देने वाली ठंडी चीजें दान में दें। इस दिन नृसिंह स्तोत्र, नृसिंह कवच और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना अत्यंत पुण्यदायक माना जाता है। रात्रि को जागरण करके भगवान नृसिंह की कथा सुनना और उनके मंत्रों का जाप करना विशेष फलदायक होता है। व्रत करने वाले दिनभर उपवास रखकर संध्या के समय पूजा कर प्रसाद ग्रहण करते हैं। पुराणों के अनुसार, हिरण्यकश्यप एक अत्याचारी असुर था जिसे ब्रह्माजी से यह वरदान प्राप्त था कि वह न किसी मनुष्य द्वारा मरेगा, न किसी पशु द्वारा, न दिन में मरेगा न रात में, न भीतर मरेगा न बाहर, न शस्त्र से न अस्त्र से। इसी अभिमान में उसने स्वयं को भगवान घोषित कर दिया और अपने पुत्र प्रह्लाद को भी अपने जैसी सोच अपनाने के लिए बाध्य किया। लेकिन प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। जब हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को कई बार मारने की कोशिश की, तब भी विष्णु ने उसकी रक्षा की। अंत में, वह अपने पुत्र को स्वयं मारने चला गया और स्तंभ की ओर इशारा कर पूछा क्या तेरा विष्णु इस स्तंभ में है, प्रह्लाद ने कहा  हां, भगवान हर जगह हैं। जैसे ही हिरण्यकश्यप ने स्तंभ को तोड़ा, उसमें से भगवान विष्णु नरसिंह रूप में प्रकट हुए। उन्होंने सांध्यकाल के समय, एक द्वार की चौखट पर, अपने नाखूनों से हिरण्यकश्यप का वध किया।

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