धरती पर स्वर्ग के अवतरण के लिए शोधित अध्यात्मिक प्रयोग है यज्ञ

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सीहोर/108 कुण्डीय गायत्री महायज्ञ के देवपूजन के साक्षी बने लगभग 400 जोड़ों को यज्ञ के दार्शनिक और वैज्ञानिक पक्ष की व्याख्या करते हुए हुए व्यास पीठ पर विराजमान ब्रह्मवादिनी बहनों की टोली नायक सुश्री दीना त्रिवेदी ने कहा कि हमारे शास्त्रों में भारतीय संस्कृति के जनक यज्ञ पिता और गायत्री माता कहे गए हैं. अर्थात गायत्री से सदवुद्धि प्राप्त होने पर ही मानव सत्कर्म करने के लिए प्रेरित होता है.यही यज्ञ का दर्शन हैं. मनुष्य को जीवन देने वाले के प्रति और जीवन यापन के आवश्यक साधन सामग्री प्रदाताओं के प्रति कृतज्ञ होकर पूज्य भाव रखना और निरंतर देते रहना यज्ञ का दर्शन है. यज्ञ कर्मकांड में देवपूजन और संगतिकरण भी आवश्यक रूप से जुडा हुआ है.उन्होंने कि आज मनुष्य की स्वार्थ और संकीर्ण विचाराधरा और भौतिकवादी सोच के फल स्वरुप चारों ओर जो असुरता और पर्यावरण असंतुलन का वातावरण बना हुआ उसके निवारण के लिए संगठित होकर देव तत्वों को पोषण देने की आवश्यकता है. वेदमूर्ति श्री राम शर्मा “आचार्य” द्वारा चलायी गई युग निर्माण योजना का लक्ष्य है कि हमारा समाज सुखी समुन्नत हो धरती पर स्वर्ग जैसा वातावरण बने. मानव जीवन में संस्कारों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए दीना दीदी ने बताया कि माँ के गर्भ में जीव चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करता हुआ मानव योनि प्राप्त करता है उसके पिछले जीवन के कई जीव संस्कार जीवात्मा के साथ आते हैं उन्हें दूर कर श्रेष्ट संस्कार स्थापित करने के लिए ऋषियों ने 16 संस्कारों की परम्परा चलाई.  आज 05 गर्भवती बहिनों के पुंसवन संस्कार सम्पन्न हुए. जिसमें गर्भवती माँ को अपनी सात्विक दिनचर्या के साथ, शारीरिक श्रम करने और तनाव मुक्त जीवनशैली अपनाने के बारे में समझाइस दी गई और कहा गया कि गर्भवती माता बहिंनों को शांतिकुंज हरिद्वार द्वारा संचालित आओ गढ़े संस्कारवान पीढ़ी के द्वारा चलाये जाने वाले ऑनलाइन क्लास के द्वारा गर्भ विज्ञान की पूरी जानकारी लेकर गर्भस्त भ्रूण को महामानव के रूप मे शिशु निर्माण कर सकती हैं.
समाज में नशे की दुष्प्रवृत्ति बढ़ती जा रहा है, जिससे फलती फूलती घर, गृहस्थियाँ उजड़ रही हैं और मनुष्य का स्वास्थ्य, एवं धन चौपट हो रहा है. मोबाइल का अधिक  उपयोग भी एक नशा है जिसके कारण साइको सोमेटिक बीमारियां बढ़ रही हैं. हमें गजेट्स के अत्यधिक और अनावश्यक उपयोग से बचना होगा. उन्होंने होताओं से यज्ञ की पूर्णहुति के रूप में अपने दोष दुर्गणों को परित्याग कर देने का आव्हान किया.

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