संस्कार देने में माता  पिता को पूर्णतः सजग रहना चाहिए — मुनिश्री संस्कार सागर जी 

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सीहोर।  श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर स्थित छावनी में आचार्य श्री विराग सागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य मुनि श्री संस्कार जी मुनिश्री आस्तिक्य सागर जी मुनि श्री प्राणीक सागर जी के सानिध्य में बाल ब्रह्मचारी शोभित भैय्या जी के  निर्देशन में श्रावक श्राविकाओ ने प्रातः श्री जी के अभिषेक शांति धारा नित्य नियम पूजा अर्चना धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कर धर्म लाभ अर्जित किया। तत्पश्चात धर्म सभा में मु मुनिश्री के प्रवचन श्रधदालुओ ने श्रवण कर धर्म लाभ अर्जित किया।
  मुनिश्री संस्कार सागर जी ने धर्म सभा में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा  कि
 कहते हैं पूत के पांव पालने में दिखाई देते है।
इसका मतलब पालने में पूत को देखना नहीं उसके पांव में कुछ भी नजर नहीं आयेगा इसका मतलब यह है कि हमारे यह है कि हमारे अंदर जों बचपन में संस्कार डल जातें हैं वे ही स्वभाव लगने लगते है वें संस्कार हम पूरी जिंदगी में भुल नहीं पाते अथवा हम यूं कहें कि पूरी जिंदगी हम उन्हीं संस्कारो के आधार पर चलाते हैं
मुनिश्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि किसी मनोवैज्ञानिक ने कहा है कि सात साल के बच्चे के संस्कार सत्तर वर्ष तक कायम रहते हैं, अभिमन्यु के संस्कार गर्भ में पैदा हुये और सौलह वर्ष बाद प्रकट हो गये। हिटलर बहुत ही पापी और खतरनाक व्यक्ति था
 उसने हजारों व्यक्तियों को जान से मार दिया लेकिन जब मरा तो लड़ाई में बिल्लियों से डर के भागने पर मरा । उसके जीवन पर खोज की गई बाद में पता चला कि हीटलर इतना क्रूर व्यक्ति होते हुए भी बिल्ली से इसलिए डर गया था कि वर्षों तक नहीं भूल पाया था कि बचपन में उसकी छाती पर एक बार बिल्ली चढ़ गई थी, जिससे इतनी ज़ोर से डर गया था कि वर्षों तक नहीं भूल पाया ये घटना दुर्घटना भी संस्कार की तरह ही जिंदगी में भुल नहीं पाता।
भगवान राम पूर्व में रात्रि आहार जल त्याग करते चले आ रहे थे तो कई भवो के  संस्कारो ने बलभद्र पद प्राप्त कराया ।और उन्हीं संस्कारों से निरंतर बचते हुए
सुसंस्कारों को अपनाना चाहिए यही जीवन की नींव है।
मुनिश्री संस्कार सागर जी ने माता पिता को संबोधित करते हुए कहा कि
संस्कार देने में माता और पिता को पूर्णतः सजग रहना चाहिए। एक बालक जब गर्भ में प्रवेश करता है तब से ही माता पिता के विचारों से परिचित होने लगता है।
नौ माह में वह पूर्णतः परिचित हो जाता है।
यदि उसमें गर्भ के समय प्रतिरोध करने की शक्ति होती तो वह वही कर देता और यदि कोई अच्छी बात ग्रहण करने की क्षमता होती तो वह वही आचरण में  उतार कर बता देता हैं ।  इस प्रभाव के कारण वह जन्म लेने के बाद यह अभिव्यक्त करके बता देता है । बच्चों का दिल बिल्कुल साफ और सुंदर निष्कषाय रहता है  उनके अंदर विकार नहीं होते इसलिए वे बच्चे सभी लोगों को बहुत ही प्यारे लगते हैं ।
यदि बच्चों जैसा  सुसंस्कारीत जीवन हम बड़ी उम्र तक जिये तो जीवन ऐसा आदर्श बन जाएगा की उसे देखकर स्वयं अपने आप में आनंद की अनुभूति होगी और दूसरों में भी आनंद को पैदा करवायेगे एक पत्थर शिल्पकार की चोटों को सहता है और सहते-सहते जब वह परमात्मा में परिवर्तित हो जाता है तब उसे उस संस्कार का फल मिलता है।
यदि परिवार मे संपन्नता और संस्कार है आपका परिवार देवों के घर से कम नहीं है। लक्ष्मी भी वही ठहरतीं है जहां घर में वात्सल्य और धर्म का माहौल होता है।
हम बड़ी उम्र तक जिए तो जीवन ऐसा आदर्श बन जाएगा कि उसे देखकर स्वयं अपने आप में भी आनंद होगा और दूसरों में भी आनंद का आनंद को पैदा करवाइए यह एक पत्थर शिल्पकार की चोटों को सता है और सहते-सहते जब वह परमात्मा में परिवर्तित हो जाता है तब उसे उसे संस्कार का फल मिल जाता है।
तत्पश्चात आहार चर्या विधी विधान से संपन्न हुई।
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