भले ही सरकार सरल नामांतरण सुविधा की ढींगे हांकती हो,लेकिन नामांतरण कराने बार-बार काटने पड़ते हैं तहसील दफ्तर के चक्कर : अवनीश बुंदेला

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भोपाल, (निप्र)। इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि जो व्यक्ति अपनी मेहनत-खून पसीने की कमाई से अपने जीवन काल में अपने और अपने परिवार के लिए आसियाना बनाता है, इसको खरीदने में अपना पेट काटकर अपने जीवन की एक आमदनी का बडा हिस्सा उसमें खर्च करता है। उसकी वह अचल संपत्ति में भूमि एक ऐसी वस्तु है की जो भी व्यक्ति इसको खरीदता है उसे भूमि को सहेज के रखता है। लेकिन वर्तमान में मध्य प्रदेश में परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी हुई हैं कि संपत्ति खऱीदने पर लगभग 10.50 प्रतिशत पंजीयन शुल्क सरकार को देने के बावजूद भी उस व्यक्ति को नगर निगम विभाग के द्वारा जिसमें नाली, सडक, बिजली और पानी जैसी मूलभूत सरकारी सुविधाओं को लाभ उसे आसानी से नहीं मिल पाता, उस सुविधा से उसे वंचित रहना पडता है। जिसका एक सबसे बडा कारण है मध्य प्रदेश में 2022 के बाद संपत्तियों की नामांतरण उचित ढंग से नहीं हो पा रहे है। मध्य प्रदेश में संपत्तियां चाहे वह खेती की जमीन हो, रहवासी जमीन हो, मकान हो या प्लाट हो, आज की तारीख में नामांतरण प्रक्रिया एक बहुत जटिल समस्या बन गई है। आम आदमी, किसानों, मध्यमवर्गीय लोगों के लिए अपनी संपत्ति का नामांतरण कराना शिखर पर चढने के समान हो गया है।यदि अपनी पहुंच रखने वाला व्यक्ति संबंधित राजस्व निरीक्षक, पटवारी, तहसीलदार से मेल मुलाकात कर सेवा शुल्क दे देता है तो भी लगभग 2 महीने चक्कर काटने के बाद संभवत: नामांतरण हो जाता है। लेकिन आम और गरीब आदमी के लिए नामांतरण कराना इतना आसान नहीं होता है।यह संज्ञान में लाना बहुत आवश्यक है कि जब एक गरीब व्यक्ति नियम अनुसार नामांतरण करवाने के लिए तहसील और नजूल विभाग जाता है जबकि उसके पास उसकी संपत्ति के समस्त दस्तावेज होते हैं और वह सारे दस्तावेज पहले से ही रिकार्ड में दर्ज भी होते हैं तब भी उससे पहले तो का जमा करवाए जाते हैं। तहसीलदार, पटवारी के चक्कर काटने के बाद पुराने रिकार्ड में भी कमी बताकर नामांतरण आवेदन को नियमों के हिसाब से निरस्त कर दिया जाता है। जबकि रिश्वत देने पर यह सारे नियम ताक पर रखकर तत्काल प्रभाव से नामांतरण कर दिया जाता है। यदि राजस्व में तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक, पटवारी के पास रिकॉर्ड अनुसार जानकारी आवेदक से मांगी जाए, जबकि पंजीयक शुल्क वह व्यक्ति पहले ही दे चुका होता है और अगर इस विषय का अध्ययन कर ढंग से जांच किया जाए तो शायद प्रदेश का यह एक बहुत बडा भ्रष्टाचार साबित होगा।
यदि हम बात ग्रामीण क्षेत्र की करें तो किसान अपना पूरा जीवन अपनी जमीन की देखभाल में निकाल देता है, वह अपनी जमीन को वह खून पसीने से सींचता है और अपने प्राणों से भी ज्यादा चाहता है। क्योंकि वही उसके जीवन यापन का एक मुख्य साधन होती है। लेकिन जब वही किसान अपनी मर्जी से वह जमीन अपने बच्चों को देना चाहता है, वसीयत बनाते हैं तो आसानी से वह नामांतरण नहीं करवा पाता है, वह उस किसान की खुद की जमीन है। इतना ही नहीं यदि किसी कारणवश किसान की मृत्यु हो जाए तो उसके परिजनों को महीनों-सालों तक तहसील के चक्कर लगाने प?ते हैं, बार-बार राजस्व निरीक्षक, तहसीलदार, पटवारी तरह-तरह के नियम का हवाला देकर उसका नामांतरण नहीं करते और वह हार-थक कर घर बैठ जाता है। नामांतरण प्रक्रिया आज की तारीख में एक बहुत मुश्किल और जटिल प्रक्रिया बन गई है।
इसी विषय को टीकमग? के कांग्रेस विधायक श्री यादवेन्द्र सिंह बुंदेला ने विधानसभा के पटल पर 21/03/2025 को उठाया और सरकार का ध्यान आकर्षित करते हुए बताया कि अकेले टीकमग? जिले की तहसीलों में 13000 से ज्यादा नामांतरण के प्रकरण लंबित हैं तथा 4383 प्रकरण नामांतरण के न्यायालय में लंबित है। जिसमें से 3993 मामले तो सिर्फ पिछले तीन माह के है और 389 पिछले छ: माह के। तहसील विभाग से एवं जिला कलेक्टर की यहां से जो प्रकरण निरस्त होते हैं उनका आधार सिर्फ एक होता है कि विक्रम संवत 2015 का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। अर्थात 1958-59 का इसलिए नामांकन निरस्त किए जाते हैं।
क्या विक्रम संवत का रिकॉर्ड लाने की जिम्मेदारी एक आम आदमी की है जो की स्टैंप ड्यूटी भी दे रहा है, संपत्ति कर, जल कर, बिजली कर सहित कई तरह के कर दे रहा है। फिर भी उससे कहा जाता है कि विक्रम संवत् 2015 का रिकॉर्ड लेकर आयें, जनता के साथ यह कैसा अन्याय है, यह कहां तक जायज है?
जब विधानसभा के पटल पर 21/03/2025 को विधायक यादवेंद्र सिंह ने मंत्री करण सिंह वर्मा को बताया कि लोक सेवा गारंटी में 929 मामले आपके पास उन्होंने भेजे थे, जिसमें से आपने 814 निरस्त कर दिए केवल 115 मामले ही स्वीकृत किये गये। इस पर मंत्री करण सिंह वर्मा जिला कलेक्टर से मिलने की हिदायत देते हैं खुद इस विषय से बचने का प्रयास करने लगे, फिर श्री यादवेंद्र सिंह जी ने जवाब में कहा कि आप जिला कलेक्टर की क्या बात करते हैं मैं राजस्व प्रमुख सचिव के कई बार खुद चक्कर लगा लगाकर आया हूं तो करण सिंह वर्मा फिर कहने लगे की आप कलेक्टर से मिलिए श्री वर्मा इस विषय पर साफ तौर पर पल्ला झा?ते हुये नजर आये। मतलब 13000 नामांतरण का आंक?ा सिर्फ अकेले टीकमग? जिले का है तो प्रदेश स्तर पर यह आंक?ा लाखों से ज्यादा का होगा। यह ब?ा हास्यपद है की तहसील में हमेशा आम नागरिकों को पुराने रिकॉर्ड का हवाला देकर परेशान किया जाता है, जबकि यदि आवेदक के पास पुराना रिकॉर्ड होता, उसकी जानकारी उसके पास होती तो वह तहसील जाता ही क्यों? और फिर तहसील और नजूल और राजस्व विभाग का फिर महत्व क्या है?
वहीं आम आदमी से तो इतना सारा रिकॉर्ड मांगते हैं, लेकिन जो कुछ खास और ताकतवर लोग होते हैं, कलेक्टर महोदय उनका नामांकन सभी नियमों को ताक पर रखकर कर देते हैं। यदि नजूल विभाग, राजस्व विभाग की बात की जाये तो इस मामले में कई जिला कलेक्टर बहुत ब?े-ब?े खेलों को अंजाम दे रहे हैं। अभी कुछ दिन पूर्व ही आदिवासियों की जमीन को बेचने की परमिशन देने के मामले में माननीय हाई कोर्ट जबलपुर ने कुछ आईएएस अधिकारियों को इस विषय में नोटिस भी दिया, उन्हें सस्पेंड भी किया गया।
सरकार में नामांतरण का गोरख धंधा खूब फल-फूल रहा है। आम जानता के नामांतरण नहीं हो पा रहे हैं, लेकिन आदिवासी की जमीन बेचने की परमिशन देने के मामले में कहीं कोई कमी नहीं छो?ी जा रही है। उदाहरण के तौर पर भोपाल में सहारा सिटी समूह की जमीन किस तरह से एक बीजेपी के नेता के परिवार को कौ?ियों के दाम दे दी जाती है। यदि यह जमीन भाजपा से जु?े राजनीतिक रसूख़ की जगह कोई पाठक या संजय नहीं होता, एक आम इंसान मांगता तो क्या राजस्व विभाग या कलेक्टर उसको यह जमीन देता? बेचारा आम व्यक्ति नियमों में ही उलझा रहता है, क्योंकि इस सब के पीछे सरकार का 22 साल से चल रहा मास्टर प्लान है, जिसे सरकार 1995 में लेकर आयी थी और 2005 में समाप्त कर दिया, 20-22 सालों की भाजपा सरकार मास्टर प्लान आज तक लागू नहीं कर सकी और इसके चलते नामांतरण जैसी गतिविधियां और भी जटिल होती जा रही है।
अगर टीएनसीपी विभाग मास्टर प्लान को शहरी क्षेत्र में ढंग से लागू कर देे तो यह समस्याएं शायद इतनी जटिल नहीं होती। इतना ही नहीं समय-समय पर राजस्व विभाग को बंदोबस्त की कार्रवाई भी निरंतर करते रहना चाहिए जो कि पिछले कई सालों से नहीं की गई है।

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