नर्मदापुरम। प्राचीन गुरु़कुल में होली के अवसर पर पलाश के फूलों को उबाल कर उसके पानी से नहाने की परंपरा है। गुरुकुल अध्यक्ष स्वामी ऋतस्पति परिब्राजक व गुरुकुल के प्रधानाचार्य सत्यसिंधु आर्य ने बताया कि हमारे यहां होली के रंग नहीं खेले जाते हैं। पलाश के रंग से ही गुलाल बनाकर उसे ही लगाया जाता है। हम स्वयं पलाश के फूलों को पानी में उबालते हैं। उसी पानी से स्नान किया जाता है। यह क्रम वर्षों से जारी है। गुरुकुल के ब्रम्हचारी व आचार्य सभी को पलाश के उबले हुए रंग से ही स्नान करना होता है। सभी उत्साह से स्नान करते हैं। दो दिन पूर्व से ही पलाश के फूल एकत्रित कर लेते हैं। उन्होंने कहा कि पलाश के आयुर्वेदिक गुण हैं। उसके रंग से शरीर में स्पूर्ति आती है। चर्म रोग नहीं होता है वहीं काया निरोगी होती है।
नए अन्न का करते हैं हवन
गुरुकुल में प्रतिदिन हवन होता है। जिसमें औषधियां रहती हैं। लेकिन होली के दिन फागुन की पूर्णिमा के अवसर सुबह के समय नए अन्न का हवन किया जाता है। जिसमें गेहूं, चना, सरसो, मसूर, सहित अन्य जितने प्रकार के अन्न इस समय उत्पन्न हुए हैं उनको हवन सामग्री में मिलाकर हवन कुंड में आहुतियां छोड़ी जाती हैं।






