देर रात्रि को पूर्ण विधि-विधान से किया नवीन मूर्तियों का प्राण-प्रतिष्ठा, 168 कलश जल से कराया स्नान
सीहोर। शहर के छावनी नगर पालिका परिसर स्थित प्राचीन चमत्कारेश्वर महादेव मंदिर में सात दिवसीय महायज्ञ एवं प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। रविवार को नगर पुरोहित पंडित पृथ्वी वल्लभ दुबे सहित अन्य विप्रजनों के द्वारा पूर्ण विधि-विधान से मंदिर में करीब 168 कलश जल से भगवान की मूर्तियों को स्नान कराया और वहीं देर रात्रि को प्राण-प्रतिष्ठा का क्रम जारी रहा। इस संबंध में जानकारी देते हुए समिति के अध्यक्ष मनोहर राय ने बताया कि क्षेत्रवासियों के सहयोग और उनकी आस्था से महोत्सव का समापन सोमवार को शाम भव्य भंडारे के साथ किया जाएगा। शाम साढ़े चार बजे हवन की पूर्ण आहुतियां और आरती की जाएगी और उसके पश्चात प्रसादी का वितरण किया जाएगा। समिति ने सभी श्रद्धालुओं से भंडारे में शामिल होने की अपील की है।
इस मौके पर कथा वाचक पंडित चेतन उपाध्याय ने बताया कि नगर पुरोहित पंडित श्री दुबे के सानिध्य में रविवार को प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव का आयोजन किया गया था। नित्य पूजन के अलावा 160 कलश से सहस्त्रार्चन किया गया। मंदिर में भगवान शिव परिवार के अलावा हनुमान जी की मूर्ति स्थापित की जा रही है। मंदिर काफी प्राचीन है। उन्होंने बताया कि सनातन धर्म में प्राण प्रतिष्ठा का बहुत ज्यादा महत्व है, मूर्ति स्थापना के समय प्राण प्रतिष्ठा जरूर किया जाता है। किसी भी मूर्ति की स्थापना के समय प्रतिमा रूप को जीवित करने की विधि को प्राण प्रतिष्ठा कहा जाता है। प्राण शब्द का अर्थ है, जीवन शक्ति और प्रतिष्ठा का अर्थ स्थापना से माना जाता है। ऐसे में प्राण-प्रतिष्ठा का अर्थ है, जीवन शक्ति की स्थापना करना अथवा देवता को जीवन में लाना। मंदिरों में जब मूर्तियां लायी जाती हैं, तो वे केवल पत्थरों की होती हैं लेकिन प्राण-प्रतिष्ठा कर उन्हें जीवंत बनाया जाता है, जिससे वे केवल मूर्तियां न रह जायें, बल्कि उनमें भगवान का वास हो। प्राण-प्रतिष्ठा के बिना कोई भी मूर्ति मंदिर में स्थापित नहीं होती है। प्राण-प्रतिष्ठा के लिए देवी या देवता की अलौकिक शक्तियों का आह्वान किया जाता है, जिससे कि वो मूर्ति में आकर प्रतिष्ठित यानी विराजमान हो जाते हैं। इसके बाद वो मूर्ति जीवंत भगवान के रूप में मंदिर में स्थापित होती है। प्राण-प्रतिष्ठा के कारण ही कहा जाता है कि एक पत्थर भी ईश्वर का रूप धारण कर सकता है. कहा जाता है कि प्राण प्रतिष्ठित किये जाने के बाद खुद भगवान उस प्रतिमा में उपस्थित हो जाते हैं।







