—आजादी के दीवानों को खुले स्थानों पर लटका दिया जाता था फांसी पर—
गुरुकुल के पास आज भी मौजूद हैं अंग्रेजों के जमाने के फांसी खंभ
.आजादी की लड़ाई में नर्मदांचल के रणबाकुरों का विशेष योगदान रहा
रश्मि शर्मा
नर्मदापुरम, ब्रिटिश हुकुमत के दौरान भारतीय नागरिकों को छोटी छोटी सी बातों पर कड़ी से कड़ी सजा दी जाती थी। खासकर आजादी के दीवानों से अंग्रेज बहुत चिड़ते थे। उनके जुल्म सहने वालों पर रहम करना और अंग्रेजी हुकू मत से आजादी की गतिविधि की जानकारी मिलने पर सजा देना उनका मुख्य कार्य था। यहां तक कि फॉसी पर भी लटका दिया जाता था। या फिॅर बंदूक से शूट कर काम तमाम कर दिया जाता था। सैंकड़ों बेनाम भारतीयों ने आजादी के लिए कु र्बानी दे दी। तब कहीं जाकर भारत आजाद हो सका है। भारतीयों ने अंग्रेजों के जुल्म बहुत सहे। आजादी की लड़ाई में नर्मदांचल के रणबांकु रों का विशेष योगदान रहा है। जिले के के दो दो राष्ट्रकवियों जिनमें माखन लाल चतुर्वेदी और भवानी प्रसाद मिश्र तथा अन्य साहित्यकारों ने आजादी की लड़ाई में अपना विशेष योगदान दिया है। इनके अलावा भी अन्य अनेक लोग रहे जिन्होने अंग्रेजों से लड़ाई लड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी चाहे उनके प्राण चले गए हों। उनमें से अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नाम जिले की कें द्रीय जेल के सामने वाले स्तंभ पर आज भी अंकि त हैं।
गुरुकुल के पास है फांसी खंभ
गुरुकुल क्षेत्र का इतिहास गवाह है कि यह गुरुकु ल 108वर्ष का हो गया है। इसी के पास शहर की पुरानी बस्ती भीलपुरा मौजूद है। जिससे यह साबित होता है कि यहां पर कालांतर में भील बड़ी संख्या में रहें होंगे। गुरुकु ल के मुख्य दरबाजे के बाहर करीब दो सौ फीट की दूरी पर एक झील नुमा क्षेत्र में दो लोहे के खंभ आधे कटे हुए आज भी मौजूद है। जिन्हें पुरानी बस्ती बीटीआई और भीलपुरा के लोग आज भी फांसी के खंभ नाम से जानते हैं। बुजुर्ग बताते थे कि उनके सामने यहां पर आजादी की लड़ाइ में हिस्सा लेने वालों को फांसी पर चढ़ा दिया जाता था।
गुरुकुल में होती थी गतिविधि
उस समय गुरुकुल ही एक ऐसी संस्था थी जो आर्य सभा के द्वारा संचालित होते हुए देश के लिए काम करने वाले लोगों के हित में आगे आती थी। इस पर अंग्रेज लोग भी निगाह रखते थे। लेकि न इसके बाद भी गुरुकु ल में आजादी के लिए ताने बाने बुने जाते थे। यहां पर राष्ट्रकवि माखन लाल चतुर्वेदी भी आंदोलन के दौरान आकर रुकते थे। उन पर भी विशेष नजर रखी जाती थाी। वरिष्ठ साहित्कार पत्रकार पंकज पटेरिया बताते हैं कि गुरुकुल के पास के फांसी खंभ की जानकारी पहले सांसद सैय्यद मूसा से भी सुनने को मिली थी। उन्होने चर्चा के दौरान बताया था कि गुरुकुल के पास के फांसी खंभ पर भारतीय को लटका दिया जाता था। उस स्थान पर जाने से लोग डरते थे।
बसंत टाकीज क्षेत्र में थी रोक
भीलपुरा के दीपचंद केवट बताते हैं कि उनके पूर्वज बताते थे कि शहर का सबसे पुराना मोहल्ला भीलपुरा ही था। यहां पर लोग नर्मदा तट होने के कारण बसते गए थे। तब अंग्रेजों का यहां पर ही आना जाना लगा रहता था। जब देखा कि गुरुकुल में लोगों का आना जाना ज्यादा होता है। तब अंग्रेजों ने बंसत टाकीज क्षेत्र वाले तिराहे से लोगों के आने जाने पर रोक लगाई थी। यहां से बीटीआई की ओर निकलने वालों से काफी पूछताछ के बाद ही निकलने दिया जाता था।






