नशे की गिरफ्त में दम तोड़ते सपने, अपराध की राह पर भटकती युवा पीढ़ी

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आखिर कब जागेगा समाज? नशे के सौदागरों पर शिकंजा कसने के साथ परिवार और व्यवस्था को भी निभानी होगी जिम्मेदारी

लेखक-संदीप पंडा
जिस उम्र में हाथों में किताबें होनी चाहिए, आंखों में सुनहरे भविष्य के सपने होने चाहिए और मन में कुछ कर गुजरने का जज्बा होना चाहिए, उसी उम्र में यदि युवा नशे की गिरफ्त में आने लगें, तो यह केवल एक परिवार की चिंता नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए गंभीर चेतावनी है। जिस युवा शक्ति को देश का भविष्य कहा जाता है, यदि वही नशे के अंधकार में अपना रास्ता खोने लगे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर हम अपनी आने वाली पीढ़ी को किस दिशा में ले जा रहे हैं? आज नशे की समस्या केवल किसी एक वर्ग, मोहल्ले या शहर तक सीमित नहीं है। शराब, तंबाकू और अन्य नशीले पदार्थों की लत अनेक परिवारों के लिए परेशानी का कारण बन सकती है। खास चिंता तब बढ़ती है, जब कम उम्र के लडक़े-लड़कियां नशे के संपर्क में आने लगते हैं। शुरुआत अक्सर दोस्तों के दबाव, जिज्ञासा, दिखावे या तनाव से बचने की कोशिश में होती है। लेकिन धीरे-धीरे यही प्रयोग आदत और कई बार गंभीर निर्भरता का रूप ले लेता है। इसके बाद युवा की प्राथमिकताएं बदलने लगती हैं। पढ़ाई, रोजगार, परिवार और भविष्य पीछे छूटने लगते हैं तथा नशा उसकी जिंदगी पर हावी होने लगता है।
नशे से अपराध तक का रास्ता, समाज के लिए खतरे की घंटी
नशे की लत और अपराध के बीच संबंध को समझना जरूरी है। हर नशा करने वाला व्यक्ति अपराधी नहीं होता, लेकिन गंभीर लत कुछ परिस्थितियों में व्यक्ति को गलत फैसलों की ओर धकेल सकती है। नशे की जरूरत पूरी करने के लिए पैसों की कमी, गलत संगत, आपराधिक तत्वों का संपर्क और विवेक पर पडऩे वाला असर चोरी, झपटमारी, मारपीट तथा अन्य अपराधों का जोखिम बढ़ा सकते हैं। नशे की हालत में वाहन चलाना, हिंसक व्यवहार करना और दूसरों की सुरक्षा को खतरे में डालना भी गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है। हालांकि अपराध बढऩे के पीछे बेरोजगारी, सामाजिक असमानता, पारिवारिक परिस्थितियां, कमजोर कानून-व्यवस्था और अन्य कई कारण भी हो सकते हैं। इसलिए हर अपराध के लिए नशे को अकेला जिम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा। लेकिन जहां नशा अपराध की परिस्थितियों को बढ़ावा दे रहा है, वहां इसे नजरअंदाज करना भी समाज के हित में नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि किसी युवा को नशे की लत लगने के बाद हम उससे मुंह मोड़ लें, तो उसे सही रास्ते पर लाने की जिम्मेदारी कौन निभाएगा? क्या केवल गिरफ्तारी और सजा से समस्या समाप्त हो जाएगी, या फिर नशे की जड़ तक पहुंचकर उसका समाधान तलाशना भी जरूरी है?
नशे के सौदागरों पर कार्रवाई, युवाओं को बचाने की ठोस पहल
नशे की समस्या से निपटने के लिए केवल जागरूकता अभियान चलाना पर्याप्त नहीं है। नशीले पदार्थों की अवैध बिक्री और तस्करी करने वालों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई जरूरी है। स्कूलों, कॉलेजों और शैक्षणिक संस्थानों के आसपास नशीले पदार्थों की अवैध उपलब्धता पर निगरानी रखी जानी चाहिए। युवाओं को नशे की आपूर्ति करने वाले नेटवर्क की पहचान कर कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई की जाए। पुलिस और संबंधित एजेंसियों को नशे के कारोबार पर अंकुश लगाने के साथ यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि नशे की गिरफ्त में आए युवाओं को उपचार और परामर्श की सुविधा मिले। कानून का उद्देश्य अपराध रोकना और समाज की सुरक्षा करना है, जबकि उपचार का उद्देश्य व्यक्ति को लत से बाहर निकालकर सामान्य जीवन में लौटने में मदद करना है। इन दोनों प्रयासों के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी है।
परिवार की खामोशी भी बन सकती है समस्या
बच्चों के व्यवहार में अचानक बदलाव, पढ़ाई से दूरी, चिड़चिड़ापन, पैसों की बार-बार मांग और गलत संगत जैसे संकेतों को परिवार को गंभीरता से लेना चाहिए। हालांकि इन संकेतों के दूसरे कारण भी हो सकते हैं, इसलिए बिना समझे किसी पर आरोप लगाने के बजाय संवाद करना अधिक जरूरी है। माता-पिता को बच्चों के साथ ऐसा संबंध बनाना चाहिए, जिसमें वे अपनी परेशानी बिना डर के बता सकें। केवल डांट, पाबंदी और अपमान से समस्या छिप सकती है, समाप्त नहीं होती। कई बार युवा तनाव, असफलता, अकेलेपन या मानसिक दबाव से जूझ रहे होते हैं। ऐसे में उनकी बात सुनना, उचित मार्गदर्शन देना और जरूरत पडऩे पर विशेषज्ञ की मदद लेना बेहद महत्वपूर्ण है। परिवार की जिम्मेदारी केवल बच्चों को सुविधाएं उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उन्हें सही और गलत के बीच अंतर समझाना भी है। बच्चों के मित्रों, दिनचर्या और गतिविधियों के प्रति जागरूक रहना चाहिए, लेकिन इस जागरूकता को अविश्वास या अनावश्यक नियंत्रण में नहीं बदलना चाहिए।
बेरोजगारी,तनाव और खाली समय का सही इस्तेमाल भी जरूरी
युवाओं को नशे से दूर रखने के लिए उन्हें सकारात्मक विकल्प उपलब्ध कराना भी आवश्यक है। खेल मैदान, पुस्तकालय, कौशल प्रशिक्षण केंद्र, सांस्कृतिक गतिविधियां और रोजगार के अवसर युवाओं को अपनी ऊर्जा सही दिशा में लगाने का अवसर देते हैं। जब किसी युवा को अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच मिलता है, तो उसके भीतर आत्मविश्वास और जीवन के प्रति उद्देश्य की भावना मजबूत हो सकती है। शिक्षण संस्थानों में नशे के दुष्परिणामों पर केवल भाषण देने के बजाय संवादात्मक कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। नशे की लत से उबर चुके लोगों के अनुभव, विशेषज्ञों का मार्गदर्शन और परामर्श सेवाएं युवाओं को वास्तविकता समझने में मदद कर सकती हैं। युवाओं को यह बताना जरूरी है कि मदद मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने की दिशा में साहसिक कदम है।
समाज भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता
अक्सर किसी मोहल्ले में नशे का कारोबार दिखाई देने के बावजूद लोग यह सोचकर चुप रह जाते हैं कि इससे उनका क्या लेना-देना। यही उदासीनता समस्या को बढऩे का अवसर दे सकती है। नागरिकों को संदिग्ध अवैध गतिविधियों की सूचना संबंधित अधिकारियों तक पहुंचानी चाहिए। साथ ही, नशे की समस्या से जूझ रहे व्यक्ति का मजाक उड़ाने या उसे सामाजिक रूप से अलग-थलग करने के बजाय उसे उपचार के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। धार्मिक, सामाजिक और स्वयंसेवी संगठनों को भी जागरूकता के साथ-साथ जरूरतमंद युवाओं को परामर्श, पुनर्वास और कौशल विकास से जोडऩे में भूमिका निभानी चाहिए। मीडिया की जिम्मेदारी भी महत्वपूर्ण है। नशे से जुड़ी घटनाओं को सनसनीखेज बनाने के बजाय उनके कारणों, प्रभावों और समाधान पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए।
आज नहीं जागे तो कल बहुत देर हो सकती है
युवा किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत होते हैं। उनके कंधों पर परिवार की उम्मीदें, समाज की जिम्मेदारियां और देश के भविष्य का भार होता है। यदि यही युवा नशे की गिरफ्त में अपनी क्षमता खोने लगें, तो उसका असर केवल उनके जीवन पर नहीं, बल्कि परिवारों, कार्यस्थलों और पूरे समाज पर पड़ सकता है। हमें यह समझना होगा कि नशे के खिलाफ लड़ाई केवल पुलिस की नहीं, केवल सरकार की नहीं और केवल माता-पिता की भी नहीं है। यह साझा जिम्मेदारी है। सरकार को प्रभावी नीतियां और उपचार सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी, पुलिस को अवैध कारोबार पर कार्रवाई करनी होगी, शिक्षण संस्थानों को जागरूकता बढ़ानी होगी, परिवारों को संवाद कायम रखना होगा और समाज को युवाओं के लिए सकारात्मक वातावरण बनाना होगा। आज जरूरत केवल नशे के खिलाफ आवाज उठाने की नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों को बदलने की भी है, जो किसी युवा को नशे की ओर धकेलती हैं। याद रखिए, किसी युवा का नशे की गिरफ्त में आना केवल उसका व्यक्तिगत नुकसान नहीं, बल्कि एक संभावित भविष्य का कमजोर पडऩा भी है। समय रहते उसे संभाल लिया जाए, तो वही युवा परिवार का सहारा, समाज की शक्ति और राष्ट्र की प्रगति का भागीदार बन सकता है। आखिर हमें तय करना है कि हम अपनी युवा पीढ़ी को नशे के अंधकार में खोने देंगे या उसे ज्ञान, रोजगार, संस्कार और आत्मविश्वास की रोशनी में आगे बढऩे का अवसर देंगे। क्योंकि जब युवा बचेंगे, तभी सपने बचेंगे; जब सपने बचेंगे, तभी समाज और राष्ट्र का भविष्य सुरक्षित रहेगा।

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