उत्तर भारत में 15 अक्टूबर तक बारिश के आसार, उत्तर-पूर्वी मानसून के आगमन की तैयारी

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नई दिल्ली (आरएनएस)। देश की मौसम प्रणाली इन दिनों बदलाव के दौर से गुजर रही है। दक्षिण-पश्चिम मानसून अपनी वापसी के अंतिम चरण में है, जबकि दक्षिणी प्रायद्वीप में अधिकांश बारिश लाने वाला उत्तर-पूर्वी मानसून दस्तक देने की तैयारी में है। इस बीच पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने से 15 अक्टूबर तक उत्तर भारत के कई हिस्सों में बारिश होने का अनुमान है। पहाड़ी क्षेत्रों के साथ उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में भी इसका प्रभाव देखने को मिल सकता है।
आने वाले दिनों में पंजाब, हरियाणा और उत्तरी राजस्थान के कुछ हिस्सों में बारिश की संभावना है। दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में 10 अक्टूबर से बारिश का दौर शुरू होने का अनुमान है। उत्तर प्रदेश और बिहार में, विशेषकर तराई क्षेत्र तथा पूर्वी जिलों में अच्छी बारिश हो सकती है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, झारखंड के ऊपर बने चक्रवाती परिसंचरण के कारण इन क्षेत्रों में बारिश की गतिविधियां बढ़ सकती हैं। झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में भी हल्की से मध्यम बारिश के आसार हैं।
मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में मौसम मुख्यत: शुष्क और गर्म रहने की संभावना है। इन क्षेत्रों के कुछ स्थानों पर तापमान सामान्य से अधिक रह सकता है। दक्षिण भारत में आंतरिक कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में बारिश जारी रहने का अनुमान है। हालांकि, मौसम की शुरुआत में हुई भारी बारिश की तुलना में अब वर्षा की तीव्रता में कुछ कमी के संकेत मिल रहे हैं।
उत्तर भारत में हो रही बारिश किसानों के लिए अनुकूल समय पर हुई है। इससे रबी की बुआई से पहले खेतों में मिट्टी की नमी बेहतर होने की उम्मीद है। गेहूं और सरसों जैसी रबी फसलों के लिए पर्याप्त नमी विशेष रूप से लाभकारी होती है।किसान आमतौर पर मानसून की वापसी से पहले खरीफ फसलों की कटाई पूरी करने का प्रयास करते हैं, ताकि तैयार फसल को बारिश से नुकसान न पहुंचे। दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी के बाद कटाई की गति भी तेज हो जाती है। रबी की पैदावार काफी हद तक शरद ऋतु की बारिश के बाद मिट्टी में बची नमी पर निर्भर करती है।
उत्तर-पूर्वी मानसून को शीतकालीन मानसून भी कहा जाता है। यह मुख्य रूप से अक्टूबर से दिसंबर के बीच दक्षिणी प्रायद्वीप को प्रभावित करता है। इसकी प्रमुख विशेषता हवाओं की दिशा में बदलाव है।

दक्षिण-पश्चिम मानसून की परिसंचरण प्रणाली में बदलाव के बाद पूर्वी और उत्तर-पूर्वी हवाएं पूर्वी तट की ओर बहने लगती हैं। ये हवाएं सामान्यत: करीब 5,000 फीट की ऊंचाई तक प्रभावी रहती हैं।
उत्तर-पूर्वी मानसून का प्रभाव मुख्य रूप से तमिलनाडु, तटीय आंध्र प्रदेश, रायलसीमा, दक्षिण आंतरिक कर्नाटक और केरल के मौसम उपखंडों पर पड़ता है। पुडुचेरी और कराईकल को भी इसके प्रभाव वाले क्षेत्रों में शामिल किया जाता है।
उत्तर-पूर्वी मानसून की औपचारिक शुरुआत केवल बारिश होने से तय नहीं होती। इसके लिए दक्षिण-पश्चिम मानसून का पूरी तरह वापस जाना और तमिलनाडु तथा तटीय आंध्र प्रदेश के तट पर लगातार पूर्वी हवाओं का चलना जरूरी है। यह प्रक्रिया सामान्यत: 10 अक्टूबर से पहले पूरी नहीं होती। उत्तर-पूर्वी मानसून के आगमन की सामान्य तिथि 20 अक्टूबर मानी जाती है और इस वर्ष भी इसके लगभग सामान्य समय पर पहुंचने की संभावना है।
दक्षिण-पश्चिम मानसून देश के अधिकांश हिस्सों से लौट चुका है, लेकिन पूर्वी भारत में इसकी वापसी धीमी हुई है। बिहार, झारखंड और ओडिशा में हाल में हुई बारिश के कारण इन क्षेत्रों से मानसून की वापसी में देरी हुई। इसके करीब 15 अक्टूबर तक पूरी तरह लौटने का अनुमान है।
उत्तर-पूर्वी मानसून पर तमिलनाडु की निर्भरता सबसे अधिक है। दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान राज्य का बड़ा हिस्सा वर्षा-छाया क्षेत्र में रहता है और इस अवधि में उसे सालाना बारिश का केवल 30 से 35 प्रतिशत हिस्सा मिलता है। इसके विपरीत अक्टूबर से दिसंबर के बीच आने वाला उत्तर-पूर्वी मानसून राज्य की वार्षिक वर्षा में करीब 48 प्रतिशत योगदान देता है।
इसलिए यह मानसून तमिलनाडु में खेती, जलाशयों में पानी के भंडारण और पेयजल की उपलब्धता के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यह आमतौर पर दिसंबर के अंत तक सक्रिय रहता है और दक्षिण भारत में वर्ष की अंतिम प्रमुख बारिश लेकर आता है।
अल नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से के असामान्य रूप से गर्म होने की घटना है। ऐतिहासिक रूप से यह जून से सितंबर के दौरान दक्षिण-पश्चिम मानसून में कम बारिश से जुड़ा रहा है। हालांकि, उत्तर-पूर्वी मानसून पर इसका प्रभाव अलग और अपेक्षाकृत कम स्पष्ट होता है।
शीतकालीन मानसून पर अल नीनो का प्रभाव आमतौर पर कम प्रतिकूल माना जाता है। कुछ वर्षों में इससे दक्षिणी प्रायद्वीप के कुछ हिस्सों में अधिक नमी वाली परिस्थितियां भी बन सकती हैं। इस वर्ष भी इसके सीधे प्रतिकूल प्रभाव की संभावना कम बताई जा रही है और दक्षिणी क्षेत्रों में सामान्य वर्षा का अनुमान है।
आने वाले दिनों में देश के अलग-अलग हिस्सों में मौसम की तस्वीर अलग रहेगी। उत्तर और पूर्वी भारत में पश्चिमी विक्षोभ तथा मानसून की बची हुई गतिविधियों के कारण बारिश होने की संभावना है। मध्य और पश्चिमी भारत में मौसम मुख्यत: शुष्क एवं गर्म रहेगा, जबकि दक्षिणी राज्यों में हल्की से मध्यम बारिश जारी रह सकती है।
अक्टूबर के मध्य तक दक्षिण-पश्चिम मानसून की पूरी वापसी के बाद दक्षिण भारत में उत्तर-पूर्वी मानसून बारिश का प्रमुख स्रोत बन जाएगा। वहीं, उत्तर भारत के पहाड़ी और मैदानी इलाकों में पश्चिमी विक्षोभ के कारण बारिश का दौर देखने को मिल सकता है।

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