सुप्रीम कोर्ट 1988 इंडियन एयरलाइंस फ्लाइट आईसी-113 क्रैश मुआवजा केस की सुनवाई फास्ट-ट्रैक में करेगा

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नई दिल्ली (आरएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने 1988 के अहमदाबाद विमान हादसे से जुड़े करीब 38 साल पुराने मुआवजा विवाद की सुनवाई तेज करने का फैसला किया है। एयर इंडिया की ओर से मामले की शीघ्र सुनवाई का अनुरोध किए जाने के बाद मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने 5 अक्टूबर 2026 को मामले को शीघ्र सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ करेगी, जिसमें न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया भी शामिल होंगे।यह मामला इंडियन एयरलाइंस की उड़ान आईसी-113 के 19 अक्टूबर 1988 को अहमदाबाद हवाईअड्डे के पास हुए हादसे से संबंधित है। विमान में चालक दल समेत 135 लोग सवार थे। हादसे में 133 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि दो यात्री जीवित बचे थे। मृतकों के परिजनों और दोनों उत्तरजीवियों ने 1989 से 1992 के बीच मुआवजे की मांग को लेकर अहमदाबाद सिटी सिविल कोर्ट में 38 दीवानी मुकदमे दायर किए थे।
अहमदाबाद सिटी सिविल कोर्ट ने 2002-03 में विभिन्न दावों पर फैसले देना शुरू किया। 24 मार्च 2003 को दिए गए कुछ महत्वपूर्ण फैसलों में मुआवजे की रकम और जिम्मेदारी तय की गई। एक मामले में अदालत ने 8.90 लाख रुपये और 6 प्रतिशत ब्याज देने का आदेश दिया तथा इंडियन एयरलाइंस और भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण को क्रमश: 70 और 30 प्रतिशत जिम्मेदार ठहराया।
इन फैसलों के खिलाफ इंडियन एयरलाइंस, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण और दावेदारों ने गुजरात हाई कोर्ट में अपील की। 14 अक्टूबर 2009 को हाई कोर्ट ने प्रमुख मामलों में देनदारी और संशोधित मुआवजे को काफी हद तक बरकरार रखा। अदालत ने माना कि हादसा इंडियन एयरलाइंस के पायलटों तथा भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण के कर्मचारियों की संयुक्त लापरवाही के कारण हुआ था। 13 नवंबर 2009 को हाई कोर्ट ने उत्तरजीवी अशोक डी. अग्रवाल समेत अन्य संबंधित दावों पर भी फैसला सुनाया।
इसके बाद 2010 में इंडियन एयरलाइंस और अन्य पक्षों ने विशेष अनुमति याचिकाओं के जरिये गुजरात हाई कोर्ट के फैसलों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। 16 फरवरी 2010 को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले पर अंतरिम रोक लगाते हुए इंडियन एयरलाइंस की ओर से आठ सप्ताह के भीतर मुआवजा राशि जमा करने का आश्वासन दर्ज किया। 1 अप्रैल 2010 को अदालत ने दर्ज किया कि इंडियन एयरलाइंस की ओर से देय राशि अहमदाबाद सिटी सिविल कोर्ट में जमा कर दी गई थी, जबकि भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण ने अपने 30 प्रतिशत हिस्से की राशि जमा कर दी थी। अदालत ने निर्धारित शर्तों और सुरक्षा के अधीन दावेदारों को राशि जारी करने की अनुमति दी।
सुप्रीम कोर्ट के सामने अब मुख्य सवाल यह है कि विमान हादसे में मुआवजे की गणना किस कानूनी आधार पर की जानी चाहिए। विवाद इस बात को लेकर है कि क्या सडक़ दुर्घटनाओं के मामलों में मोटर वाहन अधिनियम के तहत अपनाई जाने वाली गणना पद्धति को विमान हादसों पर भी लागू किया जा सकता है या विमानन दुर्घटनाओं के लिए सामान्य अपकृत्य कानून के सिद्धांतों पर आधारित अलग तरीका अपनाया जाना चाहिए।
पीडि़तों के परिवारों का तर्क है कि विमान में यात्रा करने वाले यात्रियों का विमान के संचालन या सुरक्षा व्यवस्था पर कोई विशेष नियंत्रण नहीं होता। इसलिए मुआवजे का निर्धारण करते समय मृतक की वास्तविक आय, भविष्य की कमाई की क्षमता, संभावित व्यावसायिक प्रगति, महंगाई और परिवार को हुए वास्तविक आर्थिक नुकसान जैसे पहलुओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
मामले का अंतिम फैसला केवल 1988 के हादसे तक सीमित नहीं रहेगा। इससे भारत में भविष्य में होने वाली विमान दुर्घटनाओं में मुआवजे की गणना के लिए व्यापक कानूनी आधार तैयार हो सकता है।
यह मामला दिसंबर 2025 में आखिरी बार सुप्रीम कोर्ट के सामने आया था, लेकिन इसके बाद इसे नियमित सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं किया गया। 1 अक्टूबर 2026 को एयर इंडिया ने दशकों पुराने विवाद की शीघ्र सुनवाई की मांग करते हुए आवेदन किया। इसके बाद 5 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मामले को शीघ्र सुनवाई के लिए न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने रखने का निर्देश दिया। पीठ में न्यायमूर्ति एन.वी. अंजड्डह्म्द्बड्ड भी होंगे, जो पहले इस विवाद से जुड़े मामले को देख चुके हैं।
1988 के आईसी-113 हादसे का फैसला देश में विमान दुर्घटनाओं से जुड़े अन्य लंबित मुआवजा मामलों के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है। मंगलुरु के आईएक्स-812 हादसे और कोझिकोड के आईएक्स-1344 हादसे से जुड़े मामलों में भी मुआवजे की गणना और दायित्व से संबंधित कानूनी सवाल सुप्रीम कोर्ट के सामने हैं।
मंगलुरु हादसा 2010 में हुआ था, जिसमें 158 लोगों की मौत हुई थी। इस मामले से जुड़े एक सुप्रीम कोर्ट के फैसले में 7.64 करोड़ रुपये और 9 प्रतिशत ब्याज का मुआवजा दिया गया था, जबकि कई परिवारों ने इससे कहीं अधिक मुआवजे की मांग की थी। कोझिकोड में 2020 में आईएक्स-1344 विमान दुर्घटना में 21 लोगों की मौत हुई थी। इस मामले में भी परिवारों ने अधिक मुआवजे का दावा किया है और संबंधित मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
2025 में अहमदाबाद में हुए एयर इंडिया के एआई-171 हादसे में 260 लोगों की मौत हुई थी। इस हादसे के बाद अंतरिम तौर पर 25 लाख रुपये का मुआवजा और टाटा समूह की ओर से 1 करोड़ रुपये की अनुग्रह राशि देने की घोषणा की गई थी। हालांकि अंतिम कानूनी मुआवजा अभी निर्धारित नहीं हुआ है। ऐसे में 1988 के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला भविष्य के दावों के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शक बन सकता है।
भारत में विमान दुर्घटना के लिए कोई एक निश्चित मुआवजा राशि निर्धारित नहीं है। मुआवजे की रकम कई परिस्थितियों पर निर्भर करती है। इनमें दुर्घटना की तारीख, उस समय लागू कानून, मृतक की आयु और आय, आश्रितों की संख्या, भविष्य में कमाई की क्षमता, उत्तरजीवी की चोट या स्थायी विकलांगता, चिकित्सा खर्च तथा एयरलाइन की देनदारी स्वीकार करने या मामले के अदालत तक पहुंचने जैसी परिस्थितियां शामिल हैं।
मृतक के परिजनों की ओर से किए जाने वाले दावे में आर्थिक निर्भरता का नुकसान, भविष्य की आय में कमी, जीवनसाथी और परिवार को हुई क्षति, चिकित्सा एवं अंतिम संस्कार का खर्च आदि शामिल हो सकते हैं। गंभीर रूप से घायल उत्तरजीवियों के मामले में दर्द और पीड़ा के साथ भविष्य के इलाज, शल्य चिकित्सा, पुनर्वास और सहायक देखभाल का खर्च भी मुआवजे का हिस्सा बन सकता है।
अंतरराष्ट्रीय यात्री उड़ानों से जुड़े कई मामलों में भारत ने वायु मार्ग से परिवहन अधिनियम, 1972 के माध्यम से मॉन्ट्रियल समझौते को लागू किया है। पुराने विमानन मुआवजा तंत्र से इसका एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि मृत्यु या चोट के मामलों में दायित्व पर पहले जैसी निश्चित ऊपरी सीमा लागू नहीं होती। मंगलुरु विमान हादसे से जुड़े मामले में केरल हाई कोर्ट भी इस व्यवस्था की व्याख्या कर चुका है।
1988 का अहमदाबाद मामला इसलिए विशेष महत्व रखता है क्योंकि इसमें पुरानी विमानन मुआवजा व्यवस्था और उस समय लागू कानूनी सिद्धांतों का प्रश्न जुड़ा हुआ है। गुजरात हाई कोर्ट ने पायलटों के आचरण को लापरवाहीपूर्ण माना था और इसी आधार पर एयरलाइन की पुरानी 2 लाख रुपये की देयता सीमा पर निर्भर रहने के प्रयास को स्वीकार नहीं किया था।
अब सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह स्पष्ट कर सकता है कि भारत में विमान दुर्घटनाओं के मुआवजा दावों का आकलन किस व्यापक कानूनी ढांचे के तहत किया जाना चाहिए। हालांकि प्रत्येक पीडि़त का अंतिम मुआवजा उसकी आयु, आय, आश्रितों, चोट या मृत्यु और अन्य व्यक्तिगत परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग हो सकता है। इसलिए किसी एक मामले में तय मुआवजे को स्वत: सभी पीडि़तों पर लागू नहीं माना जा सकता।

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