हम ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं करेंगे, अमेरिका के 100 प्रतिशत टैरिफ की धमकी पर भारत की प्रतिक्रिया

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नई दिल्ली (ए.) । रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाने का रास्ता अब अमेरिका में साफ होता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने रूस और ईरान पर प्रतिबंधों से जुड़े विधेयक को 262-159 मतों से पारित कर दिया है। यह विधेयक अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास जाएगा। उनके हस्ताक्षर के बाद यह कानून बन सकता है। विधेयक में रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखने वाले देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का अधिकार राष्ट्रपति को देने का प्रावधान है। भारत और चीन को इस प्रावधान से प्रभावित होने वाले प्रमुख खरीदारों के तौर पर देखा जा रहा है।
अमेरिकी कांग्रेस में विधेयक पारित होने के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। मंत्रालय ने दोहराया कि भारत अपने 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। इसके लिए भारत अलग-अलग स्रोतों से ऊर्जा हासिल करने और बाजार की बदलती परिस्थितियों के आधार पर अपनी रणनीति तय करता रहेगा।
विदेश मंत्रालय के मुताबिक, पिछले कुछ महीनों के दौरान भारत और अमेरिका के अधिकारियों के बीच इस मुद्दे पर उच्च स्तर पर बातचीत हुई है। भारत ने अमेरिका को स्पष्ट किया है कि प्रस्तावित टैरिफ के असर केवल दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रह सकते, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।
भारत ने यह भी कहा है कि वह अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाने के लिए प्रतिबद्ध है। सरकार इन घटनाक्रमों के संभावित असर से निपटने के लिए भारतीय व्यापार और उद्योग जगत के साथ मिलकर काम करेगी।
‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ के तहत राष्ट्रपति ट्रंप को रूस से तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है। विधेयक का उद्देश्य रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना और उसकी ऊर्जा आय को प्रभावित करना है। हालांकि, टैरिफ लगाना अपने आप में अनिवार्य नहीं है; विधेयक राष्ट्रपति को ऐसा करने का अधिकार देता है।
भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है। इसी वजह से अमेरिकी कांग्रेस में हुई चर्चा के दौरान भारत और चीन का विशेष रूप से उल्लेख हुआ। विधेयक पारित होने के बाद अब अगला महत्वपूर्ण कदम राष्ट्रपति ट्रंप के हस्ताक्षर का होगा। इसके बाद यह स्पष्ट होगा कि अमेरिका इस अधिकार का इस्तेमाल किन देशों और किन परिस्थितियों में करता है।

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