नई दिल्ली(आरएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने कक्षा में अनुशासन बनाए रखने और यौन दुर्व्यवहार के बीच स्पष्ट अंतर करते हुए कहा है कि शिक्षक का गलत निर्णय या अनुचित शारीरिक दंड अपने आप में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो) के तहत अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने पश्चिम बंगाल के एक स्कूल शिक्षक के खिलाफ दर्ज पॉक्सो मामले और विशेष पॉक्सो अदालत में लंबित पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने 8 सितंबर को दिए अपने आदेश में कहा कि शिक्षक का व्यवहार, विशेष रूप से छात्राओं को शारीरिक दंड देना और उनके साथ संवेदनशीलता नहीं बरतना, उचित नहीं था। हालांकि, दोनों छात्राओं के बयानों को ध्यान से पढऩे के बाद यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि शिक्षक ने पॉक्सो अधिनियम की धारा 10 के तहत गंभीर यौन अपराध किया था।
मामला पश्चिम बंगाल के एक स्कूल का है। आरोप था कि भूगोल की कक्षा में दो नाबालिग छात्राएं सवालों का जवाब नहीं दे पाईं और अपनी भूगोल की मानचित्र पुस्तक भी लेकर नहीं आई थीं। इस पर शिक्षक ने दोनों छात्राओं की पीठ और कमर पर डंडे से पिटाई की थीसुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शिक्षक इस स्थिति को अधिक संवेदनशीलता के साथ संभाल सकता था। बच्चों, विशेषकर छात्राओं के साथ व्यवहार करते समय शिक्षक को अधिक सावधानी और संवेदनशीलता बरतनी चाहिए।
हालांकि, शिक्षक की इस कमी या शारीरिक दंड को पॉक्सो अधिनियम की धारा 10 के तहत यौन अपराध नहीं माना जा सकता।
पीठ ने शिक्षक के खिलाफ लगाए गए आरोपों के सामाजिक और पेशेवर प्रभाव पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि किसी बालिका विद्यालय या सह-शिक्षा विद्यालय में पढ़ाने वाले शिक्षक पर इस तरह का आरोप लगना और उसके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलना उसके पूरे जीवन और करियर पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है।
अदालत ने कहा कि शिक्षक का अपना परिवार भी है। उस पर छात्राओं के यौन उत्पीडऩ का आरोप लगना उसके लिए बेहद गंभीर परिणाम वाला हो सकता है। यदि लंबे मुकदमे के बाद शिक्षक निर्दोष भी साबित हो जाए, तब भी उसके सम्मान और प्रतिष्ठा को हुआ नुकसान पूरी तरह वापस नहीं आ सकता।
पीठ ने कहा कि पॉक्सो अधिनियम के तहत चलने वाली कठोर आपराधिक कार्यवाही के कारण आरोपी को जो नुकसान हो चुका है, उसकी भरपाई बाद में मिलने वाली बरी होने की राहत से पूरी तरह नहीं हो सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की कहानी पर संदेह करने के कई आधार बताए। इनमें प्राथमिकी दर्ज कराने में हुई देरी और स्कूल के प्रधानाचार्य तथा महिला शिक्षिकाओं की ओर से शिक्षक के खिलाफ आपराधिक मामला शुरू कराने का तरीका भी शामिल था।
पीठ ने कहा कि प्रधानाचार्य और शिक्षिकाओं के बयान मुख्य रूप से सुनी-सुनाई बातों पर आधारित थे। ऐसे में आपराधिक मुकदमे को आगे जारी रखने की अनुमति देना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और आरोपी शिक्षक के साथ गंभीर अन्याय होगा।
राज्य सरकार की ओर से पेश वकील ने प्राथमिकी, परामर्श-सह-जांच रिपोर्ट और शुरुआती जानकारी का हवाला देते हुए दलील दी कि इनसे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि शिक्षक की छात्राओं के साथ व्यवहार करते समय यौन उत्पीडऩ की मंशा थी। उनका कहना था कि इस स्तर पर आपराधिक कार्यवाही को रद्द करना जल्दबाजी होगी।
शिकायतकर्ता ने परामर्श-सह-जांच रिपोर्ट में दर्ज आरोपों के अलावा यह भी कहा था कि शिक्षक ने छात्राओं को अनुचित तरीके से छुआ। तीन अन्य छात्राओं ने भी आरोप लगाया कि शिक्षक ने उन्हें छुआ नहीं, लेकिन उसके देखने का तरीका अनुचित था, जिससे वे असहज महसूस करती थीं।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने दोनों छात्राओं के बयानों और उपलब्ध सामग्री का विश्लेषण करने के बाद कहा कि शिक्षक के आचरण को पॉक्सो अधिनियम की धारा 10 के तहत गंभीर यौन अपराध मानने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है।
इस मामले में जुलाई 2025 में पॉक्सो अधिनियम की धारा 10 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। यह धारा गंभीर यौन उत्पीडऩ से संबंधित है। मामला आगे बढ़ते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय तक पहुंचा था।
सुप्रीम कोर्ट ने इस वर्ष अप्रैल में कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश को खारिज करते हुए विशेष पॉक्सो अदालत में लंबित पूरी कार्यवाही को समाप्त कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चों के साथ अनुचित व्यवहार या शारीरिक दंड को उचित नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन हर अनुचित व्यवहार को पॉक्सो अधिनियम के तहत यौन अपराध का रूप नहीं दिया जा सकता।
शीर्ष अदालत के इस फैसले में एक ओर शिक्षकों द्वारा बच्चों के साथ संवेदनशील व्यवहार की आवश्यकता पर जोर दिया गया है, वहीं दूसरी ओर पॉक्सो कानून जैसी कठोर आपराधिक धाराओं के इस्तेमाल के लिए आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों की सावधानीपूर्वक जांच करने की आवश्यकता भी रेखांकित की गई है।
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