नई दिल्ली, (आरएनएस)। भारत की अध्यक्षता में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में बड़ी कूटनीतिक सफलता हासिल हुई है। सम्मेलन में ब्रिक्स के सभी सदस्य देशों ने संयुक्त घोषणा पत्र यानी नई दिल्ली घोषणा पर सर्वसम्मति से सहमति जताई। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और सदस्य देशों के बीच मतभेदों के बीच इस सहमति को भारत के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। नई दिल्ली घोषणा में किसी देश का नाम लिए बिना सभी प्रकार की आक्रामकता की निंदा की गई है। घोषणा पत्र में स्पष्ट किया गया है कि संघर्षों को समाप्त करने और अंतरराष्ट्रीय विवादों का समाधान निकालने के लिए बातचीत और कूटनीति ही आगे बढऩे का रास्ता है। समूह ने बातचीत और कूटनीति के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने के अपने संकल्प को दोहराया। संयुक्त घोषणा पत्र में एकतरफा शुल्क और गैर-शुल्क उपायों के बढ़ते इस्तेमाल पर गंभीर चिंता जताई गई है। ब्रिक्स देशों ने कहा कि ऐसे उपाय वैश्विक व्यापार को प्रभावित करते हैं और विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अनुरूप नहीं हैं। समूह ने एकतरफा दबाव डालने वाले उपायों की भी निंदा की और कहा कि इस तरह के कदम अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ हैं। घोषणा में परमाणु खतरों और विभिन्न क्षेत्रों में संघर्ष बढऩे के जोखिम को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई है। शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि ब्रिक्स किसी के खिलाफ नहीं है, बल्कि सभी को साथ लेकर चलने का प्रयास करता है। उन्होंने कहा कि भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता लोगों पर केंद्रित और मानवता को प्राथमिकता देने वाले दृष्टिकोण से प्रेरित है। प्रधानमंत्री ने कहा कि अगले 20 वर्षों के लिए ब्रिक्स को एक नया और महत्वाकांक्षी एजेंडा तैयार करना होगा। उन्होंने ब्रिक्स समुदाय निरंतरता एवं क्रियान्वयन तंत्र तथा नाविकों की सुरक्षा सहित कई प्रस्ताव भी सम्मेलन के समक्ष रखे।
संयुक्त घोषणा पत्र में ब्रिक्स देशों ने जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल 2025 को हुए आतंकवादी हमले की कड़ी निंदा की। समूह ने कहा कि आतंकवाद के सभी कृत्यों की कड़ी निंदा की जानी चाहिए और उन्हें आपराधिक तथा अनुचित माना जाना चाहिए, चाहे उनकी प्रेरणा कुछ भी हो और वे कभी भी, कहीं भी या किसी के द्वारा किए गए हों।
घोषणा पत्र में आतंकवादियों की सीमा पार आवाजाही, आतंकवाद के वित्तपोषण और आतंकवादियों को सुरक्षित ठिकाने उपलब्ध कराने समेत आतंकवाद से निपटने के लिए समूह की प्रतिबद्धता दोहराई गई।
संयुक्त घोषणा पर सहमति बनाने के लिए ब्रिक्स के शेरपा शिखर सम्मेलन से पहले कई दिनों से लगातार बातचीत कर रहे थे। सदस्य देशों के बीच पश्चिम एशिया के संघर्ष को लेकर मतभेदों के कारण घोषणा पत्र की भाषा पर सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण था।
भारत के करीबी सहयोगी ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच युद्ध के कारण पैदा हुए मतभेदों का असर भी वार्ता पर दिखाई दे रहा था। इससे पहले इसी वर्ष मई में हुई ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में संयुक्त घोषणापत्र पर सहमति नहीं बन पाई थी।
रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान चाहता था कि ब्रिक्स अमेरिकी और इजरायली हमलों तथा पश्चिमी प्रतिबंधों की स्पष्ट रूप से निंदा करे। वहीं, संयुक्त अरब अमीरात की मांग थी कि घोषणा पत्र में खाड़ी क्षेत्र और वहां मौजूद सुविधाओं पर ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों का उल्लेख किया जाए।
मतभेदों को दूर करने के लिए भारतीय अधिकारियों ने रूस, ब्राजील और मिस्र के साथ मिलकर ईरान तथा संयुक्त अरब अमीरात के प्रतिनिधियों के साथ अलग-अलग दौर की बातचीत की। इन चर्चाओं का उद्देश्य ऐसी भाषा पर सहमति बनाना था, जिसे दोनों पक्ष स्वीकार कर सकें।
आखिरकार ब्रिक्स के सभी सदस्य देशों के बीच संयुक्त घोषणा पर सहमति बन गई। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, व्यापार से जुड़े मतभेदों और आतंकवाद जैसे संवेदनशील मुद्दों के बीच सर्वसम्मति से घोषणा जारी होना भारत की अध्यक्षता के दौरान एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।
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