नई दिल्ली (आरएनएस)। भारत और नेपाल ने अपनी 1,880 किलोमीटर लंबी खुली सीमा से जुड़े अतिक्रमण और सीमा पार कब्जे के मामलों के दस्तावेजीकरण की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। दोनों देश सीमा पर स्थित 10 गज चौड़ी निर्जन भूमि की पट्टी, जिसे दासगजा या नो-मैन्स लैंड कहा जाता है, से लगे अतिक्रमणों का मानचित्रण करने के लिए ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल करने पर सहमत हुए हैं। इस प्रक्रिया के तहत अंतरराष्ट्रीय सीमा के पार जमीन पर किए गए कब्जों का भी दस्तावेज तैयार किया जाएगा।
यह फैसला पिछले सप्ताह लखनऊ में हुई सर्वेक्षण अधिकारी समिति की 13वीं बैठक में लिया गया। समिति में नेपाल के सर्वेक्षण विभाग और भारतीय सर्वेक्षण विभाग के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं। बैठक में दोनों देशों के अधिकारियों ने सीमा क्षेत्रों में अतिक्रमण और सीमा पार कब्जे की स्थिति का तकनीकी तरीके से आकलन करने पर सहमति जताई।
इसके तहत उन क्षेत्रों की ड्रोन से तस्वीरें और अन्य आंकड़े जुटाए जाएंगे, जहां अंतरराष्ट्रीय सीमा के आसपास अतिक्रमण या सीमा पार कब्जे की शिकायतें हैं। दोनों देशों के अधिकारी मिलकर ऐसे स्थानों की पहचान करेंगे और उनके आधार पर तकनीकी मूल्यांकन तैयार करेंगे।नेपाल के सर्वेक्षण विभाग के उपनिदेशक सुशील डांगोल के अनुसार, सीमा पार कब्जे के मानचित्रण को तीन वर्ष के भीतर पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
इस प्रक्रिया की शुरुआत मानसून समाप्त होने के बाद की जा सकती है।
सर्वेक्षण के बाद भारत और नेपाल संयुक्त रूप से सत्यापित तकनीकी अभिलेख तैयार करेंगे। इन अभिलेखों का इस्तेमाल भविष्य में अतिक्रमण हटाने, भूमि को उसके मूल स्वरूप में बहाल करने या मुआवजे से जुड़े मामलों पर बातचीत के लिए किया जा सकेगा।
भारत और नेपाल के बीच सीमा से जुड़े कई मुद्दे लंबे समय से विवाद का विषय रहे हैं। हाल में नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने संसद में कहा था कि भारत ने नेपाली भूमि पर अतिक्रमण किया है और नेपाल ने भी भारतीय भूमि पर अतिक्रमण किया है। उनके इस बयान को लेकर दोनों देशों में राजनीतिक बहस तेज हो गई थी।
बालेन शाह ने यह टिप्पणी लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी क्षेत्रों से जुड़े सवालों के संदर्भ में की थी। इन क्षेत्रों को लेकर भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं।
भारत-नेपाल सीमा से लगे बिहार के छह जिलों में 108 निगरानी टावर बनाए जाने की भी योजना है। इस संबंध में पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, सीतामढ़ी, मधुबनी, सुपौल और अररिया के जिलाधिकारियों को पत्र भेजे गए हैं।
इन निगरानी टावरों के निर्माण के लिए प्रत्येक स्थान पर 10 मीटर गुणा 10 मीटर भूमि की आवश्यकता होगी। सीमा की निगरानी मजबूत करने और संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने के लिए इन टावरों का निर्माण किया जाएगा।
भारत-नेपाल सीमा के साथ स्थित निर्जन भूमि की पट्टी में हाल के समय में अतिक्रमण और स्थायी निर्माण की गतिविधियों को लेकर चिंता बढ़ी है। कुछ स्थानों पर भारत विरोधी गतिविधियों की भी जानकारी सामने आई है। ऐसे में दोनों देशों के बीच ड्रोन के माध्यम से संयुक्त मानचित्रण और तकनीकी अभिलेख तैयार करने की पहल को सीमा प्रबंधन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
संयुक्त सर्वेक्षण से सीमा के संवेदनशील क्षेत्रों में वास्तविक स्थिति का स्पष्ट और प्रमाणिक रिकॉर्ड तैयार होने की उम्मीद है, जिससे भविष्य में अतिक्रमण और भूमि विवाद से जुड़े मामलों के समाधान में दोनों देशों को मदद मिल सकती है।
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