बिना वकालत के अनुभव के भी बन सकेंगे सिविल जज! सुप्रीम कोर्ट ने दी 2027 तक बड़ी राहत

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नई दिल्ली,(आरएनएस)। न्यायिक सेवा यानी सिविल जजों की भर्ती के नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने मई 2025 के अपने उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें सिविल जज बनने के लिए वकील के रूप में व्यावहारिक अनुभव को जरूरी माना गया था। हालांकि, अदालत ने अनुभव की अनिवार्य अवधि को तीन साल से घटाकर एक साल कर दिया है। यह फैसला भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कई पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनाया। मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सिविल जज (कनिष्ठ श्रेणी) की परीक्षा में शामिल होने के लिए उम्मीदवार के पास वकील के रूप में कम से कम तीन वर्ष का अनुभव होना चाहिए। अब अदालत ने इस अवधि को घटाकर एक वर्ष कर दिया है। यानी सामान्य स्थिति में न्यायिक सेवा परीक्षा में शामिल होने वाले उम्मीदवारों के लिए एक वर्ष की वकालत का अनुभव पर्याप्त होगा। पीठ ने अपने पिछले फैसले के मूल सिद्धांत को बरकरार रखते हुए केवल अनुभव की अनिवार्य अवधि में बदलाव किया है। सुप्रीम कोर्ट ने उन अभ्यर्थियों को विशेष राहत दी है, जो मई 2025 के फैसले के बाद न्यायिक सेवा परीक्षा की तैयारी और भर्ती प्रक्रिया के संक्रमणकाल से गुजर रहे हैं। अदालत ने कहा कि 20 मई 2025 के फैसले की तारीख से लेकर 31 मार्च 2027 तक परीक्षा देने वाले उम्मीदवारों पर वकालत के अनुभव की शर्त लागू नहीं होगी। इसका मतलब है कि इस अवधि में बिना वकालत के अनुभव वाले उम्मीदवार भी परीक्षा में शामिल होकर चयनित हो सकते हैं। हालांकि, ऐसे चयनित उम्मीदवारों के लिए अदालत ने प्रशिक्षण की अतिरिक्त व्यवस्था तय की है।जिन उम्मीदवारों का चयन बिना वकालत के अनुभव के होगा, उन्हें पहले एक वर्ष तक प्रशिक्षु न्यायिक अधिकारी के रूप में काम करना होगा। इसके बाद उन्हें एक वर्ष की व्यवस्थित प्रशिक्षण अवधि पूरी करनी होगी, जिसमें न्यायिक कार्यप्रणाली को व्यावहारिक रूप से समझने का अवसर मिलेगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बिना वकालत के अनुभव के न्यायिक सेवा में आने वाले उम्मीदवारों को न्यायिक कार्य का पर्याप्त व्यावहारिक प्रशिक्षण मिल सके। न्यायिक सेवा परीक्षा में सफल होने वाले उम्मीदवारों को राज्य न्यायिक अकादमी में एक वर्ष का प्रशिक्षण दिया जाएगा।इसके बाद उन्हें न्यायिक अधिकारियों के साथ व्यावहारिक कार्य का अनुभव प्राप्त करना होगा।
प्रशिक्षण व्यवस्था में छह महीने जिला न्यायाधीश या उच्च न्यायिक सेवा के किसी अधिकारी के अधीन तथा अगले छह महीने उच्च न्यायालय के मौजूदा न्यायाधीश के अधीन कार्य सीखने की व्यवस्था बताई गई है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मई 2025 के निर्णय के खिलाफ दाखिल कई पुनर्विचार याचिकाओं पर आया है। इन याचिकाओं में सिविल जज (कनिष्ठ श्रेणी) की परीक्षा में शामिल होने के लिए तीन वर्ष की वकालत अनिवार्य किए जाने का विरोध किया गया था। शीर्ष अदालत ने पहले इन पुनर्विचार याचिकाओं पर नोटिस जारी किया था और खुले न्यायालय में सुनवाई की अनुमति दी थी। नए फैसले से न्यायिक सेवा में प्रवेश की तैयारी कर रहे युवाओं को बड़ी राहत मिली है। अदालत ने एक ओर न्यायिक अधिकारियों के लिए व्यावहारिक अनुभव की आवश्यकता को बरकरार रखा है, वहीं दूसरी ओर संक्रमणकाल में परीक्षा देने वाले अभ्यर्थियों के लिए विशेष व्यवस्था करते हुए भर्ती प्रक्रिया को सुगम बनाया है।

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