देश में बढ़ती नशीले पदार्थों की तस्करी पर सुप्रीम कोर्ट गंभीर, केंद्र और राज्यों से मांगा जवाब

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नई दिल्ली,(आरएनएस)। देश में नशीले पदार्थों के बढ़ते कारोबार और मादक पदार्थों की तस्करी के फैलते नेटवर्क पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। शीर्ष अदालत ने कहा कि नशीले पदार्थों का सेवन और उनकी तस्करी अब किसी एक क्षेत्र तक सीमित समस्या नहीं रह गई है, बल्कि इसका असर देश के विभिन्न हिस्सों में दिखाई दे रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने केंद्र सरकार और सभी राज्यों को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मादक द्रव्य और मन: प्रभावी पदार्थ अधिनियम से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की।

पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं।
सुनवाई के दौरान अदालत ने संकेत दिया कि नशीले पदार्थों से जुड़ी चुनौती लगातार गंभीर होती जा रही है। ऐसे में कानून लागू करने वाली एजेंसियों और न्यायिक व्यवस्था को मिलकर इससे निपटने के लिए अधिक प्रभावी रणनीति तैयार करने की आवश्यकता है।
पीठ के सदस्य न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने मादक पदार्थों की तस्करी के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने ‘गोल्डन क्रिसेंट’ जैसे क्षेत्रों का उल्लेख करते हुए भारत की भौगोलिक स्थिति से जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा की।
भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमाएं ऐसे कई क्षेत्रों के निकट हैं, जहां से मादक पदार्थों की अवैध आवाजाही के मार्ग सक्रिय माने जाते हैं। अफगानिस्तान और म्यांमार से जुड़े मार्गों के कारण देश में नशीले पदार्थों की तस्करी रोकना सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।
यह मामला भारतीय जनता पार्टी के नेता और अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दाखिल याचिका से जुड़ा है। याचिका में मादक द्रव्य और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम से जुड़े मामलों की जांच से लेकर मुकदमे के अंतिम निपटारे तक पूरी प्रक्रिया को अधिक तेज, पारदर्शी और प्रभावी बनाने के लिए कई सुझाव दिए गए हैं।
याचिकाकर्ता ने मांग की है कि नशीले पदार्थों से जुड़े मामलों की जांच और सुनवाई के लिए स्पष्ट समयसीमा निर्धारित की जाए, ताकि लंबे समय तक चलने वाले मुकदमों की संख्या कम की जा सके।
याचिका में विधि-विज्ञान प्रयोगशाला की रिपोर्ट दाखिल करने के लिए भी निश्चित समयसीमा तय करने की मांग की गई है। मादक पदार्थों के मामलों में बरामद सामग्री की वैज्ञानिक जांच महत्वपूर्ण साक्ष्य मानी जाती है। रिपोर्ट मिलने में देरी होने पर जांच और मुकदमे की प्रक्रिया दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
याचिका में तलाशी और जब्ती की पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी अनिवार्य करने का सुझाव दिया गया है। इसके अलावा नमूने लेने और जब्त सामग्री की सूची तैयार करने की प्रक्रिया को भी रिकॉर्ड करने की मांग की गई है।
मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़े मामलों का तेजी से निपटारा करने के लिए विशेष अदालतों के गठन की मांग भी याचिका में की गई है।
याचिका में कहा गया है कि केवल तस्करों के खिलाफ कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके वित्तपोषकों और पूरे अवैध नेटवर्क से जुड़े लोगों की पहचान कर उनके खिलाफ भी प्रभावी कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।
इसके अलावा अवैध गतिविधियों से अर्जित संपत्तियों की समय पर पहचान, कुर्की और जब्ती की प्रक्रिया को मजबूत बनाने का सुझाव दिया गया है।
याचिका में बदलते नशीले पदार्थों के चलन को देखते हुए नए मन:प्रभावी पदार्थों की पहचान के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग की गई है। ऐसी समिति नए पदार्थों का वैज्ञानिक अध्ययन कर उन्हें प्रतिबंधित पदार्थों की सूची में शामिल करने के संबंध में समयबद्ध सुझाव दे सकती है।
याचिका में नशीले पदार्थों की समस्या को केवल स्वास्थ्य या कानून-व्यवस्था का विषय न मानकर राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जोडऩे की मांग की गई है। इसमें आशंका जताई गई है कि नशीले पदार्थों के अवैध कारोबार से अर्जित धन का इस्तेमाल संगठित अपराध और आतंकी गतिविधियों के वित्तपोषण में किया जा सकता है।
ऐसे में तस्करी के पूरे नेटवर्क, वित्तीय लेनदेन और अवैध संपत्तियों पर एक साथ कार्रवाई करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
अब केंद्र सरकार और सभी राज्यों के जवाब दाखिल होने के बाद सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई महत्वपूर्ण होगी। अदालत यह तय कर सकती है कि मादक द्रव्य और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम से जुड़े मामलों की जांच, साक्ष्यों की सुरक्षा, वैज्ञानिक रिपोर्ट और मुकदमों के निपटारे की व्यवस्था को अधिक समयबद्ध, पारदर्शी और प्रभावी बनाने के लिए किन कदमों की आवश्यकता है।
शीर्ष अदालत की यह पहल ऐसे समय महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जब देश में नशीले पदार्थों की तस्करी के बदलते तौर-तरीकों और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़ी चुनौतियों को लेकर सुरक्षा एजेंसियों की चिंता लगातार बढ़ रही है।
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