नागरिकों को तय फुटपाथ पर चलने का मौलिक अधिकार, स्कूल जाते समय लडक़े की दुखद मौत पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा

Join Us

नई दिल्ली,(आरएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि, नागरिकों को तय फुटपाथ पर चलने का मौलिक अधिकार मिलना चाहिए. अपने पिता के साथ स्कूल जा रहे पांच साल के बच्चे की दुखद मौत पर रोशनी डालते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ये बात कही.अदालत ने कहा कि, चलने का मौलिक अधिकार, जो आर्टिकल 19(1)( डी) में दिया गया है, पहियों पर चलने के अधिकार से पहले आता है. सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि इस अधिकार के लिए सुरक्षित, अच्छी तरह से तय फुटपाथ और पैदल चलने वालों के लिए क्रॉसिंग की जरूरत है, जिसके बिना भारत की सडक़ों पर परिवारों को ऐसी दुखद घटनाओं का सामना करना पड़ता है जिनसे बचा जा सकता है।
कोर्ट ने कहा कि, नागरिकों को तय फुटपाथ पर चलने का मौलिक अधिकार मिलना चाहिए, और जहां भी सडक़ है, अधिकारियों की यह जिम्मेदारी है कि वे ऐसे फुटपाथ दें और उनका रखरखाव करें.जस्टिस पीएस नरसिम्हा और अतुल एस चंदुरकर की बेंच ने कहा कि हालांकि चलने का अधिकार जिंदगी से जुड़ा हुआ है, हमारा संविधान इसे एक मौलिक अधिकार के तौर पर मान्यता देता है और इसकी गारंटी देता है. अदालत ने कहा, सभी नागरिकों को भारत के पूरे इलाके में आजादी से घूमने का हक होगा.फैसला लिखने वाले जस्टिस नरसिम्हा ने कहा, किसी भी जवान पिता की तरह, अपील करने वाले ने अपने पांच साल के बेटे को प्यार से तैयार किया और सुबह 9 बजे उसे पड़ोस के स्कूल छोडऩे के लिए घर से निकला. किसने सोचा होगा कि यह उसके बेटे के साथ आखिरी वॉक होगी.जब पिता और बेटा स्कूल की ओर जा रहे थे, तो पीछे से एक टैंकर आया और लडक़े को टक्कर मार दी, जिससे उसकी कमर और शरीर का निचला हिस्सा कुचल गया. चोटों के कारण उसकी मौत हो गई. उन्होंने आगे कहा, मान लीजिए, वहां न तो कोई फुटपाथ था और न ही पैदल चलने वालों के लिए कोई क्रॉसिंग थी.उन्होंने कहा कि इस तरह की दुर्घटनाएं होती रहती हैं, शायद वे तब तक होने ही हैं जब तक हम सडक़ों तक पहुंच के मामले में अपने अधिकारों के सिस्टम को फिर से नहीं बनाते और उनके जुड़े हुए कामों को नहीं पहचानते. उन्होंने आगे कहा कि तब तक, हम इन दुखद घटनाओं से निपटने के लिए उन्हें नियमित तौर पर एफआईआर और मोटर एक्सीडेंट क्लेम में बदलते रहेंगे.उन्होंने आगे कहा, यह जरूरी है, बल्कि मजबूर करने वाला है, कि हम पहले अपने दिमाग से यह गलतफहमी दूर करें कि चलने का यह अधिकार सिर्फ पहियों पर चलने से जुड़ा है. हमने अपने रास्ते पर पहिए लगने से बहुत पहले ही चलना शुरू कर दिया था।
जस्टिस नरसिम्हा ने कहा कि आर्टिकल 19(1)( डी) के तहत आने-जाने का पहला अधिकार पैदल चलने का मौलिक अधिकार है. यह अधिकार पहियों पर चलने के अधिकार से पहले आता है और इस कीमती अधिकार में सुरक्षित और अच्छी तरह से तय फुटपाथ तक पहुंच की गारंटी भी शामिल होनी चाहिए. उन्होंने कहा, नागरिकों का तय फुटपाथ पर चलने का मौलिक अधिकार पहला है और इसे मोटर वाली गाडिय़ों से चलने पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए.
उन्होंने कहा कि यह शुरू में एलीटिज्म भी हो सकता है, क्योंकि पहियों वाली मशीनें सिर्फ अमीरों के लिए थीं, लेकिन जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था आगे बढ़ी और सस्ती मोटर गाडिय़ां आईं, मोटर वाली परिवहन की पूरी रेंज सडक़ों पर हावी हो गई. पैदल चलने वालों को इस हद तक किनारे कर दिया गया कि उन्हें ड्राइवरों के लिए एक परेशानी माना जाने लगा, जो नियमति तौर पर पैदल चलने वालों और उनके फुटपाथ पर गाड़ी चढ़ा देते हैं.
उन्होंने कहा, अब से यह बंद हो जाना चाहिए क्योंकि हम मोटर वाली सडक़ों के किनारे बने फुटपाथ पर चलने के मौलिक अधिकार का ऐलान करते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि मोटर व्हीकल एक्ट, 1988, ऐसा कानून नहीं है और न ही कभी रहा है जो चलने के मौलिक अधिकार को मान्यता देता हो.
जस्टिस नरसिम्हा ने कहा, असल में, मोटर व्हीकल एक्ट एक रुकावट रहा है और कई तरह से, पैदल चलने वालों के कीमती अधिकारों को कमजोर किया है. चलने के लिए सुरक्षित और आरामदायक फुटपाथ की कमी, और जब वे होते भी हैं, तो उनका मोटर ट्रांसपोर्ट के अधीन होना, एक सभ्यता की समस्या रही है.
उन्होंने कहा, असल में, जहां भी सडक़ है, वहां एक अच्छी तरह से बना फुटपाथ बनाने में कितना समय लगता है. चलने के मौलिक अधिकार के लिए बस एक आरामदायक जगह चाहिए जहां आसानी से और बेफिक्र होकर चला जा सके. क्या यह एक नगरपालिका प्राधिकरण का नागरिकों के प्रति कम से कम फर्ज नहीं होना चाहिए.
उन्होंने कहा कि, पैदल चलने ने हमेशा भारतीय सोच को जगाया है. इसकी गहरी सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक और सुधारात्मक जड़ें हैं. उन्होंने कहा, चलना सिर्फ घूमना नहीं है, यह निश्चित रूप से आर्टिकल 19(1)( ए), आर्टिकल 19(1)( बी) और आर्टिकल 19 (1)( सी) के तहत बोलने, इक_ा होने और संगठन के अधिकारों को दिखाता है. दुर्भाग्य से, हम इन पहलुओं को इस हद तक पहचानने में नाकाम रहे हैं कि पैदल चलने वाला शब्द को बुरा माना जाने लगा है.
जस्टिस नरसिम्हा ने कहा, हालांकि अब हमें अपने नागरिकों को तय फुटपाथ पर चलने का यह बुनियादी अधिकार देना चाहिए और सुरक्षित करना चाहिएज् अगर कोई सडक़ है, तो यह पक्का करना जरूरी है कि पैदल चलने वालों के लिए एक फुटपाथ तय हो और उसे बनाए रखा जाए. यह एक लागू करने लायक कर्तव्य है.
बेंच ने कहा कि तय फुटपाथ पर चलने के अधिकार की बात करें तो, हालांकि यह आर्टिकल 21 और 19(1)( डी) का जरूरी हिस्सा है, लेकिन इसके लिए कोई कानून नहीं है और न केवल अधिकार घोषित करने के लिए बल्कि कर्तव्य निभाने वालों को पहचानने के लिए भी एक कानूनी ढांचा बनाना जरूरी है.
बेंच ने कहा, हम रजिस्ट्री को निर्देश देते हैं कि वह हमारे फैसले की एक कॉपी हाउसिंग और शहरी मामलों, ग्रामीण विकास, सडक़ परिवहन और राजमार्ग मंत्रालयों को भेजे, ताकि जरूरी कानूनी ढांचा शुरू करने की जरूरी जरूरत पर विचार किया जा सके. एक कॉपी लॉ कमीशन को भी भेजी जा सकती है ताकि अधिकार की रक्षा के लिए कानूनी ढांचे की जांच की जा सके, जिम्मेदारों की पहचान की जा सके और उपाय दिए जा सकें. बेंच ने कहा कि तय फुटपाथ पर चलने के बुनियादी अधिकार को बढ़ाने और असरदार बनाने के लिए एक नियामक निकाय बनाना जरूरी है.
बेंच ने कहा कि संविधान के पार्ट 3 के तहत चलने का अधिकार एक बुनियादी अधिकार है. यह भारत के संविधान के आर्टिकल 19(1)( डी) के तहत गारंटी वाले आने-जाने के अधिकार का जरूरी हिस्सा है, जिसे आर्टिकल 19(1)( ए), आर्टिकल 19(1) (बी), आर्टिकल 19(1) (सी) और आर्टिकल 21 के साथ पढ़ा जाए. चलने के बुनियादी अधिकार में तय फुटपाथ का अधिकार भी शामिल होगा. ये अधिकार मुख्य हैं और मोटर गाडिय़ों से आने-जाने पर इन्हें प्राथमिकता दी जाएगी.
जस्टिस नरसिम्हा ने कहा, अगर सडक़ है, तो यह पक्का करना हमारी जि़म्मेदारी है कि पैदल चलने वालों के लिए तय और अच्छी तरह से मेंटेन किए गए फुटपाथ हों. यह जिम्मेदारी शहरी विकास अथॉरिटी, नगर निगम, नगर पालिका और यहाँ तक कि पंचायतों की भी है, जिन्हें फुटपाथ और पैदल चलने वालों के लिए दूसरे जरूरी आधारभूत संरचना को तय करने, बनाने, रखरखाव करने और सुरक्षित रखने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि चलना जिंदगी का जरूरी हिस्सा है.
उन्होंने कहा कि तय फुटपाथ पर चलने के अधिकार का उल्लंघन नागरिकों को ड्यूटी पर रहने वालों के खिलाफ मुआवजे और मुआवजे के लिए संवैधानिक और कानूनी उपायों का इस्तेमाल करने का अधिकार देगा. जस्टिस नरसिम्हा ने कहा, हम रजिस्ट्री को निर्देश देते हैं कि वह इस केस को संविधान के आर्टिकल 32 के तहत एक पिटीशन के तौर पर री-नंबर करे और केस का टाइटल बदलकर पुन: पैदल चलने और फुटपाथ का मौलिक अधिकारकर दे. भारत सरकार, आवास और शहरी मामले, ग्रामीण विकास और सडक़ परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के जरिए, खुद एक पार्टी के तौर पर शामिल है. हम ्रस्त्र के.एम. नटराज से कोर्ट की मदद करने का अनुरोध करते हैं.
पिता ने 25 लाख रुपये के मुआवजे के लिए दावा याचिका दायर की थी, और एमएसीटी ने 30 मई, 2016 को याचिका की तारीख से रकम मिलने तक 6 फीसदी सालाना ब्याज के साथ 7,82,000 रुपये का अवॉर्ड दिया. पिता और इंश्योरेंस कंपनी हाई कोर्ट गए. हाई कोर्ट ने मुआवजा घटाकर 4,70,000 रुपये कर दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एमएसीटी द्वारा दिए गए मुआवजे को कम करके हाई कोर्ट ने गलती की है. जस्टिस नरसिम्हा ने कहा कि मुआवज़े को फिर से गणना करने की जरूरत है, जैसे कि निर्भरता के नुकसान के लिए 10,11,528 रुपये, कंसोर्टियम के नुकसान के लिए 96,800 रुपये, संपत्ति के नुकसान के लिए 18,150 रुपये और अंतिम संस्कार के खर्च के लिए 18,150 रुपये दिए जाए. बेंच ने कहा कि, इस मामले को देखते हुए, अपील करने वाले 11,44,628 रुपये के मुआवजे के हकदार होंगे और यह रकम आज से दो महीने के अंदर देनी होगी.
००

 

Previous articleविजय सेतुपति की अगली फिल्म का टाइटल पॉकेट नॉवेल, साथ नजर आएंगी मालविका मोहनन, पहला पोस्टर जारी
Next articleप्रदेश का सर्वांगीण विकास ही शासन का संकल्प : मुख्यमंत्री डॉ. यादव