अमेरिकी हमले में भारतीयों की मौत पर देशभर में गुस्सा, अमेरिकी मंत्री रुबियो ने नहीं मांगी माफी

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नई दिल्ली (आरएनएस)। होर्मुज स्ट्रेट में एक टैंकर पर किए गए अमेरिकी हमले में तीन भारतीयों की मौत को लेकर देशभर में गुस्सा बढ़ रहा है. लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि भारत खुलकर अमेरिकी कदम का विरोध क्यों नहीं कर रहा है. उन्हें अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के उस बयान से भी हैरानी हुई, जिसमें उन्होंने भारत से माफी मांगने या फिर खेद जताने की जगह पर अपने कदम को सही ठहराया.रुबियो ने कहा कि अमेरिकी प्रतिबंधों का कोई भी दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. अब लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या भारत अमेरिकी उपनिवेशवाद का हिस्सा बन रहा है? स्टेट डिपार्टमेंट के मुख्य डिप्टी प्रवक्ता टॉमी पिगॉट ने बताया कि रुबियो ने इस बात पर जोर दिया कि अमेरिकी नाकेबंदी का उल्लंघन और ईरानी तेल की गैर-कानूनी ढुलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी.अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने कहा, अमेरिका के विदेश मंत्री ने जोर दिया कि सभी कमर्शियल जहाजों को अमेरिकी सेना के आदेशों का तुरंत पालन करना चाहिए। क्योंकि वो इस स्ट्रेट में शांति और सुरक्षा बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं.
अमेरिकी सेना ईरान के बंदरगाहों की नाकेबंदी लागू कर रही है. यह कदम तेहरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को असल में बंद कर देने के जवाब में उठाया गया है. यह एक अहम रास्ता है जिससे दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस का व्यापार होता है. इससे पहले, भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा था, विदेश मंत्री मार्को रुबियो से बात हुई. मैंने खाड़ी में अमेरिकी नौसेना के उन हमलों पर भारत की कड़ी आपत्ति दोहराई, जिनमें तीन भारतीय नाविक मारे गए थे. उन्होंने कहा, व्यावसायिक जहाजों के खिलाफ इस तरह की जानलेवा कार्रवाई उचित नहीं है.
विदेश मंत्री की नरम प्रतिक्रिया और मार्को रुबियो की आक्रामक प्रतिक्रिया ने भारतीय नीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं. कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने आश्चर्य व्यक्त किया कि अमेरिका ने पूरी घटना पर कोई भी दुख प्रकट नहीं किया.
थरूर ने कहा, अमेरिका का यह आधिकारिक बयान पढक़र गहरा सदमा लगा है, जिसमें बेगुनाह भारतीयों की जान जाने पर अफसोस या संवेदना का जरा भी जिक्र नहीं है. कोई दोस्त और रणनीतिक साझेदार इतना असंवेदनशील कैसे हो सकता है ?
कांग्रेस सांसद ने सवाल किया कि नियमों का पालन न करने वाले कमर्शियल जहाज को दूसरे, गैर-घातक तरीकों से क्यों नहीं रोका जा सका और क्या आम क्रू सदस्यों की जान लेने के मकसद से मिसाइल दागे बिना जहाज के प्रोपल्शन या स्टीयरिंग को बेकार नहीं किया जा सकता था ?
वरिष्ठ रक्षा विशेषज्ञ ब्रह्मा चेल्लानी ने लिखा कि यदि ऐसी ही घटना चीन या फिर रूस के साथ होती, तो अमेरिका को जवाब मिल गया होगा. उन्होंने लिखा, इसका उदाहरण 1999 में बेलग्रेड में दूतावास पर हुआ हमला है, जब यू.एस. की मिसाइलों ने यूगोस्लाविया में चीन के दूतावास पर हमला किया था, जिसमें तीन चीनी पत्रकार मारे गए थे. इस घटना के बाद हफ्तों तक सरकार की मंजूरी से अमेरिका-विरोधी विरोध-प्रदर्शन हुए, बीजिंग में यू.एस. दूतावास पर पत्थरबाजी हुई और बीजिंग तथा वॉशिंगटन के बीच बातचीत पूरी तरह बंद हो गई.
अमेरिका के येल यूनिवर्सिटी में अध्यापन का कार्य कर रहे सुशांत सिंह ने एक्स पर लिखा, भारतीयों को अमेरिका से जो उम्मीदें थीं, वे इस क्रम में हैं: – भारतीयों की हत्या के लिए माफी, भारतीयों की मौत पर अफसोस, भविष्य में ऐसी घटनाओं के दोबारा न होने का भरोसा, कार्रवाई के नियमों में बदलाव का वादा.
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने कहा कि विदेश नीति के मामलों में भारतीयों की जिंदगी को नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता. उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब गंभीर सवाल बिना जवाब के हैं, तो चुप्पी जवाबदेही का विकल्प नहीं हो सकती. देश को स्पष्टता मिलनी चाहिए और परिवारों को न्याय मिलना चाहिए.
आपको बता दें कि जून को अमेरिकी सेना ने पलाऊ के झंडे वाले तेल टैंकर मैरीवेक्स को बेकार कर दिया, जिस पर 24 भारतीय नाविक सवार थे. सभी क्रू सदस्यों को सुरक्षित बचा लिया गया. 10 जून को अमेरिका ने पलाऊ के झंडे वाले एक और टैंकर सेटेबेलो पर हमला किया, जिसमें सवार 24 भारतीय नाविकों में से तीन की मौत हो गई. वर्तमान विवाद इससे ही जुड़ा है. अभी गुरुवार को भी एक और जहाज जलवीर पर हमला हुआ, जो गिनी-बिसाऊ के झंडे वाला टैंकर था और जिस पर 20 भारतीय सवार थे.

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