सुप्रीम कोर्ट ने दहेज हत्या के एक मामले में सोमवार को आरोपी पति को आजीवन कारावास की सजा सुनाते हुए समाज के सामने गंभीर सवाल खड़े किए। अदालत ने कहा कि बेटियों की शादी बचाने की चिंता और सामाजिक बदनामी का डर कई बार महिलाओं को मौत के मुंह में धकेल देता है।
जस्टिस पीके मिश्रा और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने फैसले की शुरुआत एक अहम टिप्पणी से की। अदालत ने पूछा, क्या युवा सोमा आचार्य की जान बचाई जा सकती थी? क्या सामाजिक बदनामी के डर ने उसे भेडिय़ों के हवाले कर दिया?
कोर्ट ने पाया कि सोमा आचार्य ने कई बार अपने माता-पिता को ससुराल में हो रही प्रताडऩा के बारे में बताया था। इसके बावजूद परिवार और गांव के बुजुर्गों ने हर बार समझौता कराने की कोशिश की और उसे वापस ससुराल भेज दिया।
फैसले में अदालत ने कहा कि सोमा ने बार-बार मदद की गुहार लगाई थी और कुछ समय के लिए मायके में भी रही, लेकिन हर बार मामला सुलझाने और वैवाहिक संबंध बनाए रखने पर जोर दिया गया। कोर्ट ने इसे समाज के लिए आंखें खोलने वाला मामला बताया।
अदालत ने कहा कि गांव के बुजुर्ग भी इस प्रक्रिया में शामिल थे और कथित समझौतों के बाद प्रस्ताव पारित किए गए थे। न्यायालय ने टिप्पणी की कि परिवार को उम्मीद थी कि हालात सुधर जाएंगे, लेकिन अंतत: सोमा की उसके ससुराल में दर्दनाक मौत हो गई।
शादी के करीब 15 महीने बाद सोमा का शव फंदे से लटका मिला था। आरोपी पति ने इसे आत्महत्या बताया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल और अन्य साक्ष्यों के आधार पर इस दलील को खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि सबूत स्पष्ट रूप से दहेज उत्पीडऩ से जुड़ी हत्या की ओर इशारा करते हैं।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सोमा को मोटरसाइकिल, टीवी और अन्य सामानों की मांग को लेकर प्रताडि़त किया जाता था। उसके माता-पिता ने कुछ मांगें पूरी भी की थीं।
बेंच ने कहा कि मृतका के शरीर पर मिले जख्म सामान्य फांसी के मामलों से मेल नहीं खाते। अदालत के अनुसार, मेडिकल साक्ष्य बताते हैं कि मौत से पहले उसके साथ हिंसा हुई थी और यह मामला नकली फांसी का प्रतीत होता है।








