सुप्रीम कोर्ट ने समीक्षा समिति बनाने की याचिका खारिज की

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 सरकारी मंदिरों के पुजारियों के वेतन का मामला

नई दिल्ली (आरएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों के पुजारियों, सेवादारों और मंदिर कर्मचारियों के वेतन और अन्य लाभों की समीक्षा के लिए एक न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति बनाने की याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया. इस मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने की.पीठ ने कहा कि जो लोग इससे परेशान हैं, वे सीधे अदालत का रुख कर सकते हैं और कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इस याचिका पर विचार करने के पक्ष में नहीं है. पीठ ने टिप्पणी की, जो लोग पीडि़त हैं, वे अपनी लड़ाई खुद लड़ेंगे…याचिकाकर्ता वकील अश्विनी उपाध्याय ने 2006 के इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने कहा था कि वक्फ की तरह ही पुजारियों और सेवादारों के लिए भी न्यूनतम सम्मानजनक वेतन सुनिश्चित किया जाना चाहिए ताकि वे गरिमापूर्ण जीवन जी सकें. वकील ने इस जनहित याचिका में उठाए गए मुद्दे के संबंध में मद्रास हाईकोर्ट के एक फैसले का भी जिक्र किया.इस पर जस्टिस मेहता ने कहा, मद्रास हाईकोर्ट और इलाहाबाद हाईकोर्ट दोनों में ही वह किसी का व्यक्तिगत मामला था. उपाध्याय ने तर्क दिया कि यह एक देशव्यापी मुद्दा है और ध्यान दिलाया कि एक भी मस्जिद या चर्च सरकारी नियंत्रण में नहीं है.शीर्ष अदालत ने उपाध्याय से पुजारियों के मामलों में न पडऩे को कहा, क्योंकि हो सकता है कि उन्हें मंदिरों के पुजारियों और सेवादारों की कमाई के बारे में जानकारी न हो. पीठ ने याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया और उपाध्याय को कानून के तहत उपलब्ध अन्य विकल्पों का इस्तेमाल करने की छूट देते हुए याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी।
इस याचिका में केंद्र और राज्यों को एक न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति बनाने का निर्देश देने की मांग की गई थी, जो सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों के पुजारियों और कर्मचारियों के वेतन व अन्य लाभों की समीक्षा कर सके.
याचिका में कहा गया, याचिकाकर्ता यह घोषणा भी चाहता है कि वेतन संहिता, 2019 की धारा 2 के तहत पुजारियों और मंदिर के कर्मचारियों को कर्मचारी माना जाए. याचिकाकर्ता का तर्क है कि एक बार जब सरकार मंदिरों का प्रशासनिक, आर्थिक और वित्तीय नियंत्रण अपने हाथ में ले लेती है, तो मालिक और कर्मचारी का रिश्ता बन जाता है. ऐसे में पुजारियों और मंदिर के कर्मचारियों को सम्मानजनक वेतन न देना, अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले आजीविका के अधिकार का उल्लंघन है.

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