नईदिल्ली,(आरएनएस)। एक बलात्कार पीडि़ता नाबालिग की गर्भावस्था खत्म करने से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को फटकार लगाई है। कोर्ट ने कहा कि यह एक बच्ची के साथ हुए बलात्कार का मामला है और पीडि़ता को जिंदगी भर इसका जख्म झेलना पड़ेगा। ये मामला 15 वर्षीय बलात्कार पीडि़ता से जुड़ा है, जो 30 हफ्ते की गर्भवती है। 24 अप्रैल को कोर्ट ने गर्भपात का आदेश दिया था, जिसके खिलाफ एम्स दिल्ली ने दोबारा अपील की थी।कोर्ट ने कहा, अगर गर्भपात से मां को कोई स्थायी दिव्यांगता नहीं होती है, तो गर्भपात की प्रक्रिया पूरी की जानी चाहिए। यह एक बच्ची के साथ हुए बलात्कार का मामला है। पीडि़ता को जिंदगी भर इसका जख्म झेलना पड़ेगा। जरा सोचिए, वह अभी एक बच्ची है। इस समय उसे पढऩा चाहिए, लेकिन हम उसे मां बनाना चाहते हैं। जरा उस दर्द और अपमान की कल्पना कीजिए, जो इस पूरी प्रक्रिया में बच्ची को झेलना पड़ा है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि पीडि़ता का गर्भ खत्म करने का फैसला पीडि़ता और उसके माता-पिता का होना चाहिए, जिसमें चिकित्सा विशेषज्ञ उन्हें सही फैसला लेने में मदद करें। पीठ ने कहा, किसी नाबालिग को बलात्कार से हुई गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर करना उसके पहले से सहे जा रहे दुख को और बढ़ा देगा। किसी भी इंसान पर अनचाही प्रेग्नेंसी थोपी नहीं जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, जब बलात्कार की वजह से पीडि़ता गर्भवती होती है, तो उसके लिए कोई समय सीमा नहीं होनी चाहिए। कानून को लचीला और बदलते समय के साथ तालमेल बिठाने वाला होना चाहिए। केंद्र सरकार कानून में बदलाव करें, ताकि बलात्कार से जुड़े ऐसे मुकदमों की सुनवाई एक हफ्ते के अंदर पूरी हो सके। आखिर बलात्कार की शिकार नाबालिग बच्चियों को लंबे समय तक मुकदमे का दंश क्यों झेलना पड़े।
एम्स की तरफ से पेश हुईं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा, इस चरण में गर्भपात करना शायद मेडिकल तौर पर मुमकिन न हो। गर्भ 30 हफ्ते का हो गया है और भ्रूण पूरी तरह से विकसित हो चुका है। नाबालिग मां को गंभीर शारीरिक विकृतियों और लंबे समय तक चलने वाली स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा हो सकता है। उन्होंने कोर्ट को गोद लेने के विकल्प का भी सुझाव दिया।
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