भारत से ओमान रवाना होगा नौसेना का इंजन रहित जहाज आईएनएसवी कौंडिन्य

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नईदिल्ली, (आरएनएस)। भारतीय नौसेना का सबसे अनोखा जहाज आईएनएसवी कौंडिन्य सोमवार को गुजरात के पोरबंदर से ओमान के मस्कट के लिए रवाना होगा। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह इसे हरी झंडी दिखाएंगे। यह इस जहाज की पहला समुद्री यात्रा होगी। यह जहाज दो हफ्तों में मस्कट यात्रा पूरी करेगा और उसके बाद इंडोनेशिया की राजधानी बाली के लिए रवाना होगा। यह वही मार्ग है जिससे होकर हजारों साल पहले व्यापार हुआ करता था। आइए इस जहाज की खासियत जानते हैं।
इस यात्रा का उद्देश्य भारत की प्राचीन समुद्री परंपराओं का परीक्षण करना है। इसका नाम प्रसिद्ध प्राचीन भारतीय नाविक कौंडिन्य के नाम पर रखा गया है। कौंडिन्य प्राचीन भारत काल में भारत से दक्षिण-पूर्व एशिया तक समुद्री यात्रा करने के लिए जाने जाते थे। आधुनिक नौसैनिक जहाजों के विपरीत आईएनएसवी कौंडिन्य में कोई इंजन, धातु की कीलें या आधुनिक प्रणोदन प्रणाली नहीं है। भारत इस यात्रा से दुनिया को देश की मेरीटाइम हेरिटेज से वाकिफ कराएगा।
आईएनएसवी कौंडिन्य पूरी तरह से हवा, पाल और 1,500 साल से भी अधिक पुरानी जहाज निर्माण पद्धति पर निर्भर है। यह एक सिलाईदार पाल वाला जहाज है जिसके निर्माण में 5वीं शताब्दी ईस्वी के दौरान भारत द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली प्राचीन तकनीकों का उपयोग करके बनाया गया है। इसका डिजाइन मुख्य रूप से अजंता गुफा चित्रों में दिखाए गए जहाजों के साथ-साथ प्राचीन ग्रंथों और विदेशी यात्रियों के वृत्तांतों पर आधारित है।
इस जहाज को सिला हुआ जहाज भी कहा जाता है क्योंकि इसके लकड़ी के तख्तों को लोहे की कीलों से जोडऩे के बजाय नारियल के रेशे (कॉयर) की रस्सियों से सिला जाता है। जहाज के बाहरी आवरण को सील करने और उसे समुद्र में चलने योग्य बनाने के लिए प्राकृतिक राल, कपास और तेल का उपयोग किया जाता है। बड़ी बात यह है कि आईएनएसवी कौंडिन्य भारतीय नौसेना से संबंधित होने के बाद भी एक युद्धपोत नहीं है।
आईएनएसवी कौंडिन्य जहाज का आकार लगभग 19.6 मीटर लंबा, 6.5 मीटर चौड़ा और लगभग 3.33 मीटर गहरा है। यह पूरी तरह से पाल से चलता है और इसमें लगभग 15 नाविकों का दल होता है। यह जहाज पारंपरिक भारतीय जहाज निर्माण तकनीक टंकाई पद्धति का अनुसरण करता है। इसमें पहले पतवार बनाई जाती और बाद में पसलियां जोड़ी जाती हैं। इसकी लचीली संरचना जहाज को दबाव में टूटने के बजाय तेज लहरों को सहन करने में मदद करती है।
यह परियोजना जुलाई 2023 में संस्कृति मंत्रालय, भारतीय नौसेना और होडी इनोवेशन के बीच एक संयुक्त समझौते के माध्यम से शुरू हुई, जिसे संस्कृति मंत्रालय से वित्त पोषण मिला। केरल के पारंपरिक शिल्पकारों की एक टीम ने कुशल जहाज निर्माता बाबू शंकरन के नेतृत्व में जहाज को हाथ से तैयार किया है। कोई ब्लूप्रिंट उपलब्ध न होने के कारण भारतीय नौसेना ने दृश्य स्रोतों का उपयोग करके डिजाइन को दोबारा तैयार करने में सहायता की है।
आईएनएसवी कौंडिन्य को फरवरी 2025 में लॉन्च किया गया था और मई में कर्नाटक के कारवार में इसे औपचारिक रूप से नौसेना में शामिल कर लिया गया था। आईएनएसवी कौंडिन्य में भारत के समुद्री इतिहास से जुड़े कई सांस्कृतिक प्रतीक मौजूद हैं। इनमें गंडाभेरुंडा (कदंबा वंश का दो सिर वाला बाज), पालों पर सूर्य के रूपांकन, सिंह याली (धनुष पर अंकित एक पौराणिक शेर की आकृति) और डेक पर हड़प्पा शैली का एक पत्थर का लंगर शामिल है।
भारत से ओमान और आगे दक्षिणपूर्व एशिया तक का मार्ग कभी एक प्रमुख व्यापारिक गलियारा हुआ करता था। भारतीय व्यापारी और नाविक इन समुद्री मार्गों का उपयोग पश्चिम एशिया, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ मसालों, वस्त्रों और विचारों का व्यापार करने के लिए करते थे। इस मार्ग पर पुन: नौकायन करके, आईएनएसवी कौंडिन्य भारत के प्राचीन समुद्री मार्गों का पुनर्प्रशिक्षण कर रहा है। यह देश के समुद्री व्यापार के लिए बड़ी उपलब्धि है।

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