कलंक को धोकर खेल की गरिमा बहाल करें

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गत दिनों एशिया कप का फाइनल भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ मुकाबला क्रिकेट प्रेमियों के लिए रोमांचक अवसर था। उपमहाद्वीप में जब-जब ये दोनों टीमें आमने-सामने होती हैं, तो इसे महज एक खेल नहीं, बल्कि करोड़ों दर्शकों के जज्बातों का संगम माना जाता है।ऐसे में उम्मीद थी कि यह फाइनल न केवल खेल कौशल का प्रदर्शन करेगा बल्कि खेलभावना की मिसाल भी पेश करेगा। मगर अफसोस कि मुकाबले के अंत में सबसे ज्यादा चर्चा खेल के नतीजे की नहीं, बल्कि ट्रॉफी वितरण के दौरान उपजे विवाद की रही। यह विवाद न केवल आयोजन समिति की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है, बल्कि खिलाडिय़ों और क्रिकेट संस्थाओं की परिपक्वता पर भी। ट्रॉफी किसी भी टूर्नामेंट की आत्मा कही जा सकती है।यह केवल धातु का ढांचा नहीं, बल्कि उस मेहनत, संघर्ष और टीम भावना का प्रतीक है जिसके लिए खिलाड़ी महीनों तक पसीना बहाते हैं। जब उसी ट्रॉफी को लेकर मंच पर विवाद की स्थिति उत्पन्न हो जाए तो यह दृश्य दर्शकों के मन में निराशा और खेल की गरिमा पर प्रश्नचिह्न छोड़ जाता है। एशिया कप जैसे भव्य टूर्नामेंट में यह और भी अस्वीकार्य है। जिस क्षण को उत्सव होना चाहिए था, वह असहमति और अव्यवस्था की भेंट चढ़ गया।भारत-पाकिस्तान संबंधों का बोझ क्रिकेट हमेशा ढोता आया है। लेकिन खेल को हमेशा इन तनावों से ऊपर बताया गया है। यह मंच आपसी कटुता को पीछे छोडक़र सद्भाव और सम्मान का संदेश देने का अवसर देता है। किंतु जब ट्रॉफी वितरण जैसे अवसर पर भी शिष्टाचार और खेलभावना की कमी दिखे तो यह साफ संकेत है कि आयोजकों और खिलाडिय़ों दोनों को आत्ममंथन की आवश्यकता है। यह केवल दो टीमों के बीच विवाद नहीं, बल्कि पूरे एशियाई क्रिकेट की छवि पर चोट है।इस घटना ने आयोजन समिति की तैयारी और निष्पक्षता पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। किसी भी अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट की सफलता केवल मैदान पर खेले गए मैचों से नहीं, बल्कि उसके समापन के सुचा आयोजन से भी आंकी जाती है। यदि उस निर्णायक क्षण में भ्रम और विवाद की स्थिति उत्पन्न हो जाए तो यह पूरे टूर्नामेंट की छवि धूमिल कर देता है। खिलाडिय़ों के लिए भी यह क्षण आत्मचिंतन का है। वे केवल अपने खेल से ही नहीं, बल्कि अपने आचरण से भी नई पीढ़ी को प्रेरित करते हैं। यदि मंच पर असहमति और विवाद दिखे तो इससे दर्शकों में गलत संदेश जाता है। क्रिकेट को जेंटलमैन गेम कहा जाता है, और उसकी गरिमा बनाए रखना हर खिलाड़ी की जिम्मेदारी है।
ट्रॉफी जीतना निस्संदेह गौरव की बात है, किंतु खेल की मर्यादा बनाए रखना उससे कहीं बड़ा दायित्व है। यदि आयोजन समिति और खिलाड़ी इस घटना से सबक नहीं लेते तो भविष्य में ऐसे विवाद बार-बार क्रिकेट की छवि को आहत करेंगे। खेल को राजनीति और अहंकार से ऊपर रखना ही उसकी असली आत्मा है। स्पष्ट है कि एशिया कप फाइनल में ट्रॉफी का विवाद एक शर्मनाक दृश्य था। इसने खेल के उस उज्ज्वल क्षण को कलंकित कर दिया जिसे आने वाले वर्षों तक यादगार होना चाहिए था। अब यह क्रिकेट संस्थाओं और खिलाडिय़ों पर है कि वे इस कलंक को धोकर खेल की गरिमा बहाल करें।
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