बिहार विधानसभा चुनाव में इस बार कई पार्टियां बिगाड़ सकती हैं खेल

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-आप, एआईएमआईएम व जनसुराज ने सभी सीटों पर चुनाव लडऩे का किया है ऐलान
पटना,(ए.)। बिहार विधानसभा का चुनाव काफी मशक्कत वाला है। एनडीए और महागठबंधन में शामिल दलों के अलावा कई ऐसी पार्टियां हैं, जो सभी 243 सीटों पर चुनाव लडऩे का ऐलान कर चुकी हैं। आम आदमी पार्टी ने ऐलान किया है कि वह किसी से गठबंधन नहीं करेगी और सभी 243 सीटों पर अकेले ही चुनाव लड़ेंगी। वहीं बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी सभी सीटों पर चुनाव लडऩे का फैसला किया है। प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी तो शुरू से ही सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की बात कहती रही है। वहीं असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम भी किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं है। वह भी ज्यादातर सीटों पर उम्मीदवार उतार सकती है। एनडीए के घटक दलों में चिराग पासवान के नेतृत्व वाली लोजपा (रामविलास) के तेवर से लगता है कि 2020 की तरह वह भी कहीं अलग होकर चुनाव मैदान में न उतर जाए। मायावती की बसपा यूपी में सरकार बनाकर और चला भी चुकी है। बिहार में भी उसकी धमक सुनाई देती रही है। उसके इक्का-दुक्का विधायक भी चुने जाते रहे हैं, लेकिन वे अपनी पार्टी में टिक नहीं पाते। चुनाव जीतने के बाद वे अन्य दल में शामिल हो जाते हैं। सत्ता से लंबे समय तक दूर रही बसपा ने इस बार बिहार की सभी 243 सीटों पर चुनाव लडऩे का फैसला किया है। यह अलग बात है कि यूपी में दो दशकों से लगातार बसपा फ्लाप हो रही है। मायावती बिहार चुनाव को अपनी राजनीति की प्रयोगशाला बनाना चाहती है। बसपा का प्रभाव शाहाबाद के इलाकों में ज्यादा है। शाहाबाद की 22 विधानसभा सीटों में 20 पर अभी महागठबंधन का कब्जा है। यह इलाका चूंकि यूपी से सटा हुआ है, इसलिए मायावती का प्रभाव उस इलाके में नजर आता है। इस बार एनडीए ने शाहाबाद में अपनी पकड़ फिर से मजबूत करने के लिए पूरा जोर लगा दिया है। पीएम मोदी ने भी इस इलाके में सभा की। महागठबंधन में शामिल कांग्रेस ने भी अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए वोटर अधिकार यात्रा निकाली थी। आरजेडी नेता तेजस्वी यादव भी शाहाबाद में महागठबंधन की बादशाहत बरकरार रखने की पूरी कोशिश कर रहे हैं।वहीं आप नेता चंद्रभूषण लंबे समय से बिहार में डेरा जमाए हुए हैं। यह सबको पता है कि बिहार में आम आदमी पार्टी की जमीन नहीं है। इसके बावजूद सभी सीटों पर वह चुनाव लडऩा चाहती है तो इसके पीछे कांग्रेस और उसका साथ देने वाली महागठबंधन की पार्टियां का खेल बिगाडऩे की मंशा है। दिल्ली में दो बार आप की सरकार रही। दूसरे राज्यों में विस्तार की योजना लंबे वक्त से इसकी रही है। हालांकि दिल्ली में सत्ता गंवाने के बाद इसके प्रति लोगों का आकर्षण कम हुआ है। फिर भी यह अगर सभी सीटों पर चुनाव लड़ती है तो कुछ वोटों का नुकसान तो होगा ही। जाहिर तौर पर यह नुकसान महागठबंधन की पार्टियों का ही होगा।वहीं प्रशांत किशोर के नेतृत्व वाली जन सुराज पार्टी अपने स्थापना काल से ही सभी सीटों पर चुनाव लडऩे की बात कहती रही है उसके निशाने पर महागठबंधन के साथ एनडीए में शामिल पार्टियां हैं। पीके बिहार में नई राजनीति की शुरुआत करना चाहते हैं। वे कहते हैं कि लालू परिवार और नीतीश कुमार के 35 साल के शासन में बिहार बेहाल हुआ है। वे अपनी राजनीति की प्राथमिकताएं भी बताते हैं। प्रशांत किशोर अपने 101 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी करने की घोषणा कर चुके हैं। वे कहते रहे हैं कि महागठबंधन और एनडीए से पहले उनके उम्मीदवारों की सूची जारी होगी। उन्होंने खुद चुनाव लडऩे की भी घोषणा की है। संभव है कि करगहर सीट से वे उम्मीदवार बनेंगे।
वहीं असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम की बिहार के सीमांचल में खासा पकड़ है। इस इलाके से उनके पांच विधायक भी जीते थे। उनमें 4 को आरजेडी ने अपने पाले में ले लिया था। इससे खफा होने के बावजूद पार्टी की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष अख्तरूल ईमान ने महागठबंधन में शामिल होने की कोशिश की। लालू यादव को पहले पत्र लिखा और बाद में मिलने की कोशिश भी की लेकिन निराशा हाथ लगी। वे कहते हैं कि चार का बदला इस बार 40 से लेंगे।
\उनका यह भी कहना है कि थर्ड फ्रंट बना कर वे बिहार में चुनाव लड़ेंगे। अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि उनके थर्ड फ्रंट में कौन-कौन दल शामिल होंगे। ओवैसी की ताकत का अंदाजा उपचुनावों में देखने को मिला। अगर ओवैसी के उम्मीदवार ने गोपालगंज में मुसलमानों के वोट नहीं काटे होते तो आरजेडी उम्मीदवार की जीत तय थी। ओवैसी की पार्टी जितनी सीटों पर लड़ेगी, उससे नुकसान महागठबंधन की पार्टियों का ही होगा।

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