::::: संभाग मुख्यालय के साथ नेताओं का भेदभाव::::
पिछ़ड़ता गया नर्मदापुरम का विकास, मनमाने बर्ताव से मन मसोस कर रह जाते हैं नर्मदापुरम वासी
बलराम शर्मा
नर्मदापुरम। संभाग मुख्यालय सिर्फ नाम का ही है। नर्मदापुरम को अपना कहने वाले कितने नेता देखे गए। मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद विधायक निगमों को संभालने वाले तमाम नेताओं ने नर्मदापुरम के लिए ढींगे बहुत हांकी। लेकिन जो संभाग के विकास व हक की बात आई तो अनेक नेताओं ने ठेंगा दिखाकर अपने अपने क्षेत्र में विकास करने की कवायदें की हैं। चाहे बुदनी में मेडीकल कालेेज की स्थापना का मामला हो। मुख्यालय की जानबूझकर घोर उपेक्षा होती रही है। क्योंकि संभाग का पूर्ण रूपेण हक था। जिसे छीना गया है। नेताजी ने अपनी विधानसभा के लिए विकास करने का झुकाव रखा संभाग के साथ पक्षपात किया है। नर्मदापुरम को दिखावा के नाम पर अपना जरूर करते रहे। लेकिन कोई बड़ी सौगात नहीं दी। यदि पूर्व के कुछ और जनप्रतिनिधियों के वर्ताव की बात करें एक नेताजी ने उनके क्षेत्र में उस समय के सबसे बढ़ा सोया प्लांट लगवाया। जो कुछ वर्षों के लिए ही रह गया। उसके बाद कबाड़ हो गया। कोई काम का नहीं रहा। उनके ही क्षेत्र डोलरिया में स्टील प्लांट की पहल की थी जिसमें वे सफल नहीं हो सके। वह जमीन बेकार चली गई। अब वहां पर अतिक्रमण हो रहा है। अच्छा खासा प्रभाव होने के बाद भी नर्मदापुरम मुख्यालय पर उन्होंने कोई खास कार्य नहीं करा सके थे। उनकी कोई बड़ी उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं है। जिसे क्षेत्र के लोग गिना सके। इसलिए उनका अपराजेय नेता का तमगा बुढ़ापे के दौरान बुरी तरह छिन गया। आखरी आखरी में उन्हें दो बार हार का सामना करना पड़ा। जबकि वे अपने अच्छे समय में अनेक बार केबीनेट में प्रभावशाली मंत्री रहे। उनके पुत्र के रोजगार के लिए जरूर बढ़ा शोरूम खुल गया। उनकी पार्टी के लिए जिले में कार्यालय तक नहीं खुल पाया। एक नेताजी का प्रदेश ही नहीं देश की राजनीति में बड़ा योगदान था। उन्हें उस समय के प्रधानमंत्री तक बहुत अच्छे से जानते थे। उन्हें बड़ा पद भी मिला था। लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कर पाए कि संभाग मुख्यालय पर उनके किसी श्रेष्ठ कार्य को नागरिक याद करा सकें। एक दूसरे नेता की बातें कर लें उन्होंने बीएसएनएल का बड़ा कार्यालय संभाग मुख्यालय पर नहीं खुलवा कर इटारसी में खुलवा दिया था। संभाग मुख्यालय पर छोटा कार्यालय रहा। अब बीएसएनएल भी काम चलाऊ रह गया। यह भी उस समय का एक भेदभाव ही था। लंबे समय तक क्षेत्र के जनप्रतिनिधि बने रहे नेताजी ने भी मुख्यालय पर बहुत अधिक उल्लेखनीय कार्य नहीं करा सके, पांच बार सांसद और दो बार मंत्री के बाद भी मुख्यालय उनसे उम्मीद करता रहा। खूब जीतते रहे लेकिन बुढ़ावे में करारी हार का सामना करना पड़ा। बांकी के नेताओं के कार्यकाल को जनता देख ही रही है। जनता जिता जिता कर उम्मीद कर रही लेकिन वे मुख्यालय पर वैसा कुछ नहीं करा पा रहे हैं। जैसा होना चाहिए। मंत्री सांसद, विधायक नाली चबूतरा, सड़क, भवन, बनवाकर वाह वाही लें तो यह तो पार्षद और सरपंच भी कर लेते हैं।
वे भी तो नेता ही थे
यदि देखा जाए तो जिन्होंने एसपीएम की स्थापना की, आरडीनेस की स्थापना की, तवा डेम बनवाने में पहल की वे भी तो नेता थे। उस समय तो सरकार के पास काफी अभाव रहता था। लेकिन उनके मन में क्षेत्र व मुख्यालय के प्रति लगाव था।






