सीहोर। वही व्यक्ति विद्वान है जो सिर्फ अच्छी बातों को महत्व देता है और व्यर्थ बातों पर ध्यान नहीं देता है, संत हमेशा सत्य मार्ग की ओर प्रेरित करता है। जहां सद्गुण और श्रेष्ठता दिखाई दे, हमें उन्हें ग्रहण करना चाहिए। जैसे मधुमक्खी फूलों से पराग लेकर शहद बना देती है, ठीक इसी तरह हमें भी श्रेष्ठ गुण ग्रहण करना चाहिए। अच्छे लोगों की अच्छी बातों में माधुर्यता, सौंदर्य, श्रेष्ठता और पावित्रता होती है, हमें उन गुणों को ग्रहण करना चाहिए। जब हमारे स्वभाव में विनम्रता और सहजता आएगी, हम बेहतर बन जाएंगे। उक्त विचार शहर के सैकड़ाखेड़ी स्थित संकल्प वृद्धा आश्रम में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान कथा वाचक पंडित राघव मिश्रा ने कहे।
बुधवार को कथा वाचक पंडित श्री मिश्रा का सम्मान और स्वागत केन्द्र के संचालक राहुल सिंह, प्रभारी नटवर कुशवाहा, जिला संस्कार मंच के जिला संयोजक जितेन्द्र तिवारी, मनोज दीक्षित मामा, श्रद्धा भक्ति सेवा समिति की ओर से आनंद व्यास, बाबू सिंह, आकाश राय, कमलेश राय आदि ने किया।
सहज भाव से विचार करे और आचरण करे
मंच के संयोजक श्री दीक्षित ने कहाकि सच्चा संत वही है, जो सहज भाव से विचार करे और आचरण करे। जब उसका मान हो, तब उसे अभिमान न हो और कभी उसका अपमान हो जाए, तो उसे अहंकार नहीं करना चाहिए। हर हाल में उसकी वाणी मधुर, व्यवहार संयमशील और चरित्र प्रभावशाली होना चाहिए। संत शब्द का अर्थ ही है, सज्जन और धार्मिक व्यक्ति। सच्चा संत सभी के प्रति निरपेक्ष और समान भाव रखता है, क्योंकि सच्चा संत, हर इंसान में भगवान को ही देखता है, उसकी नजर में हर व्यक्ति में भगवान वास करते हैं, इसलिए उस पर किसी भी तरह के व्यवहार का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। सच्चा संत वही है, जिसने अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया हो और वह हर तरह की कामना से मुक्त हो। संत के इस वचन को सुनकर भगवान अभिभूत हो गए। परोपकार करने वाले सच्चे संत के ऐसे ही विचार होते हैं। असल में गेरुए वस्त्र पहनने और हिमालय पर चले जाने मात्र से कोई साधु नहीं बन जाता, बल्कि सच्चा संपूर्ण मानवता के लिए समर्पित होकर सबके विकास को गति देता है। कहा गया है कि संत की पहचान इस बात में नहीं है कि उसे शास्त्रों का कितना अधिक ज्ञान है, बल्कि उसके द्वारा लोकहित में किये गए कार्य उसे सच्चा संत बनाते हैं। सच्चे संत का इस संसार में बड़ा महत्व है, क्योंकि वह ईश्वर का एक प्रतिनिधि होता है, सच्चा संत का पूरा जीवन ईश्वर को समर्पित होता है








