ओल्ड होशंगाबाद गोल्ड नर्मदापुरम होने के बाद भी सुस्त है विकास की धारा
नर्मदापुरम(बलराम शर्मा )। नर्मदापुरम का वैसा विकास नहीं हो सका जैसा होना था। विकास के मामले में नर्मदापुरम से कहीं बुदनी तहसील आगे निकलती नजर आ रही है। क्योंकि जैसी भी हो वहां पर दो बड़ी कंपनी कार्य कर रही हैं। मेडिकल कालेज खुल रहा है। बुदनी में रेलवे की नई लाइन डलने के साथ बुदनी एक बड़ा जंक्शन का रूप लेने की स्थिति में पहुंचेगा। और भी कुछ कुछ नया होने वाला है। यह शिवराज सिंह चौहान जैसे नेता ने अपने क्षेत्र की चिंता करते हुए विकास करके दिखाने की कोशिश की है। ऐसा ही कुछ पूर्व के नेताओं ने अपनी इच्छा शक्ति से एसपीएम, आर्डीनेंस, जैसी ईकाईयां यहां पर स्थापित कराने में सफलता हासिल की थी। विकास के क्षेत्र में तवा बांध भी गिना जा सकता है। जिससे हरित क्रांति आई है। उसके बाद भाजपा शासन काल में यदि वास्तविक विकास के मामले में कोई बढ़ी उपलब्धि गिनी जाए तो करीब दो अरब की लागत से तैयार हुए लाजिस्टिक हब को गिना जाता। लेकिन वह अपने वास्तविक स्वरूप में नहीं आ सका। जैसे सपने दिखाए थे वैसा नहीं बन सका। चाहे कांग्रेस शासन काल हो या भाजपा शासन काल पिछले तीन दशक से टाईमपास करने वालों ने विकास की सारी संभावना वाले नर्मदापुरम की घोर उपेक्षा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। या ऐसा भी कहा जा सकता है कि उनसे वास्तविक विकास नहीं हो सका। चाहे पूर्व सांसद के रूप में रामेश्वर नीखरा हो, स्व. सुंदरलाल पटवा हों, अनेक बार सांसद मंत्री रहे स्व. सरताज सिंह, पूर्व में अनेक विभागों के मंत्री रहे स्व. हजारी लाल रघुवंशी हों या अन्य नेता हों। हल्के फुल्के विकास के प्रयास किए हैं। लेकिन क्षेत्रीय नेतागण वास्तविक विकास को गति देने में सफल नहीं हो सके। सडक़, पुल, पुलिया, नाली चबूतरे निर्माण, अन्य सामान्य विकास व हारमोनियम, ढोलक झांझ मंजीरों का वितरण, किक्रेट की सामग्री, कुछ इसी तरह की सामग्री का वितरण करके समय पास करने में ही रूचि दिखाते रहे हैं।
न फेक्ट्री न मेडिकल कॉलेज
मोहासा, कीरतपुर, डोलरिया, माखन नगर बाबई कृषि फार्म जैसे स्थान का चयन कई वर्षों से विकास के आयाम तय करने के लिए होता रहा। यहां पर इतने वर्ष बाद भी काम चलाऊ ही कार्य हो सका है। उल्लेखनीय कार्य नहीं हो सके हैं। न कोई नई बड़ी फेक्ट्री, कंपनी खुल सकी, न संभाग मुख्यालय होते हुए भी मेडिकल, इंजीनियरिंग कालेज, शासकीय बीएड कालेज खुल सके। संभाग मुख्यालय मेडीकल व कृषि के क्षेत्र में एजूकेशन हब बन सकता था लेकिन पर्याप्त जगह होने के बाद भी इच्छा शक्ति की कमी रही।
खुल जाना था मेडीकल कॉलेज
जब प्रदेश के अनेक संभागों में मेडिकल कालेज खुले हैं। तो नर्मदापुरम संभाग की घोर उपेक्षा क्यों हुई? यहां पर 123 वर्ष पूर्व दानदाताओं ने अपनी सकारात्मक सोच के चलते बढ़ा अस्पताल शहर के बीचोंबीच तैयार किया था। इसी अस्पताल को विकसित किया जाना चाहिए था। पर्याप्त जगह है। पीएम स्थल से लेकर ट्रामा तक तथा जहां पर शासकीय डाक्टर और स्टाफ के आवास बने है उसे भी अस्पताल के लिए लिया जाना था। दो मंजिल तीन चार मंजिल बनाकर मेडीकल कालेज खुल सकता था। लेकिन करोड़़ों रूपये स्वीकृत होने के बाद भी अस्पताल का दूसरा हिस्सा आरटीओ कार्यालय के पास बनाकर न जाने कौनसी समझदारी दिखाई जा रही है।
उपेक्षित है बस स्टेंड का जंक्शन
संभाग मुख्यालय वर्षों पूर्व से बसों का जंक्शन है। यहां से कई दिशाओं की ओर बसें प्रस्थान करती हैं। यदि इटारसी रेलों का जंक्शन है तो नर्मदापुरम बसों का जंक्शन है। पर्याप्त जगह होने के बाद भी बस स्टेंड को सही रूप नहीं दिया जा सका है। एक बढ़बोला अधिकारी आया था उसने यहां पर चंडीगढ़ के बस स्टेंड का सपना दिखाया और टाइमपास किया और चलता बना। बस स्टेंड अभी भी बदहाल बना हुआ है। यहां पर पुराने आवास से लेकर पुराने आरटीओ कार्यालय तक एक बार फिर से नया नक्शा बनाकर बहुत अच्छा बसों का जंक्शन बनाया जा सकता है।
ओल्ड होशंगाबाद गोल्ड नर्मदापुरम
शहर का संभाग का नामकरण नर्मदापुरम कहने सुनने में अच्छा लगता है। लेकिन यदि ओल्ड होशंगाबाद था और अब गोल्ड नर्मदापुरम हो गया तो फिर विकास को पंख लगना चाहिए था। लेकिन विकास की गति कछुआ चाल से भी धीमी है। ऐसा विकास देखकर तो कछुआ भी शरमा जाए। कुछ तो कांग्रेसी और भाजपाई गुटबाजी के चलते भी विकास को पंख नहीं लग सके। अब भी इस महत्वपूर्ण संभाग व संसदीय क्षेत्र में तीन भाजपा के प्रमुख प्रदेश अध्यक्ष, उन्हीं में से दो सांसद, संभाग व संसदीय क्षेत्र में अनेक मंत्री दर्जनों भाजपा के विधायक पूर्व विधायक होने के बाद भी विकास नहीं हो सका तो फिर क्या कहा जाए?






