विधानसभा चुनाव से ऐन पहले महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए बिहार सरकार ने सरकारी नौकरियों में 35 प्रतिशत आरक्षण की बात की है। अब तक सभी महिलाओं को मिलने वाले इस आरक्षण पर नीतीश कैबिनेट ने डोमिसाइल नीति लागू की है। यह स्थानीय प्रमाणपत्र होता है। राज्य सरकारें इनके आधार पर स्थानीय युवाओं को सरकारी नौकरियों, शैक्षणिक संस्थानों और स्थानीय योजनाओं में प्राथमिकता देती हैं। इसके बाद अन्य राज्यों की महिलाएं भी सामान्य कोटे में आवेदन कर सकेंगी। यह व्यवस्था पहले ही हरियाणा, मप्र, हिप्र, राजस्थान और उत्तराखंड में लागू है। बिहार के युवा अन्य राज्यों की नीति के चलते नुकसान झेलने की बात करते रहे हैं। बैठक में कुल 43 एजेंडों पर मुहर लगी जिनमें युवा आयोग और दिव्यांगजन सिविल सेवा प्रोत्साहन योजना भी है। दिव्यांगों को प्रोत्साहित करने तथा पुरुष दिव्यांग अभ्यर्थियों को पिछड़ा, सामान्य और आर्थिक तौर पर कमजोर युवाओं के लिए यह योजना है। बिहार में 60 प्रतिशत जातीय-आर्थिक आरक्षण पहले से ही लागू है। 35 प्रतिशत मूल बिहारी महिलाओं के इस आरक्षण के बाद यह बढ़ कर 74 प्रतिशत पर पहुंच जाएगा जिसका सीधा असर अनारक्षित वर्ग पर पड़ेगा जिसके लिए बस 14 प्रतिशत सीटें ही बचेंगी। वर्तमान में राज्य में 18 प्रतिशत अतिपिछड़ा, 12 प्रतिशत अन्य पिछड़ा, 16 प्रतिशत एससी, एक प्रतिशत एसटी और ओबीसी महिलाओं का 3त्न आरक्षण लागू है। इसमें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग का 10 प्रतिशत भी है। शीर्ष अदालत द्वारा आरक्षण की सीमा पर लगाम लगाने की नसीहतों को चुनौती देते हुए राज्य सरकारें चुनावी लाभ के लोभ में इस तरह की कवायद करती रहती हैं। समर्थकों और मतदाओं को लुभाने के आधार पर आरक्षण के जाल फेंकती हैं। विपक्ष का भी आरोप है कि मतदाताओं के रुझान का आभास होते ही नीतीश सरकार द्वारा यह दांव चला गया है। हालांकि देखने में आता है कि महिलाओं की लाभकारी योजनाओं का ऐलान करके पूर्ववर्ती सरकारों ने खासा चुनावी लाभ लिया था। मगर यह उन शिक्षित और जरूरतमंद महिलाओं के भविष्य के लिए बेहतर साबित हो सकता है, जो विभिन्न कारणों से नौकरी के लिए परिवार से दूर नहीं जा सकतीं। दिव्यांगों को सिविल सेवा के लिए तैयार करने की यह योजना यदि सार्थक रहती है, तो इसे देश के स्तर पर लागू करने के प्रयास भी होने चाहिए।






