- संदीप पंडा।
आज का युग आधुनिकता, तकनीक और भौतिक सुख-सुविधाओं का युग माना जाता है, लेकिन इसके साथ ही मानवीय रिश्तों में बढ़ती दूरियां भी चिंता का विषय बन गई हैं। जिस परिवार में एक ही मां की कोख से जन्मे भाई-बहन प्रेम, सहयोग और त्याग का प्रतीक माने जाते थे, वहीं आज कई जगहों पर संपत्ति, जमीन और पैसों के लालच में रिश्तों का खून होते देखा जा रहा है।
कलयुग का प्रभाव इस कदर बढ़ता दिखाई दे रहा है कि भाई, भाई को पहचानने से इंकार कर रहा है और बहन-भाई के पवित्र रिश्तों में भी स्वार्थ की दीवारें खड़ी हो रही हैं। आए दिन समाचार पत्रों और टीवी चैनलों में ऐसी खबरें देखने को मिलती हैं, जहां पुश्तैनी संपत्ति के विवाद में भाई ने भाई की हत्या कर दी या जमीन के एक टुकड़े के लिए वर्षों पुराने रिश्ते टूट गए। यह स्थिति केवल परिवारों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चिंताजनक है।
रिश्तों की मजबूती का आधार केवल खून का संबंध नहीं, बल्कि संस्कार, प्रेम, सम्मान और आपसी विश्वास होता है। दुर्भाग्य से आज की पीढ़ी भौतिक सफलता की दौड़ में इन मूल्यों से दूर होती जा रही है। बच्चों को विज्ञान, गणित और तकनीक की शिक्षा तो दी जा रही है, लेकिन रिश्तों की अहमियत, परिवार के प्रति जिम्मेदारी और नैतिक मूल्यों की शिक्षा अपेक्षित स्तर पर नहीं मिल पा रही है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या अब स्कूलों में रिश्तों और पारिवारिक मूल्यों का पाठ पढ़ाना जरूरी नहीं हो गया है? यदि बच्चों को प्रारंभिक अवस्था से ही प्रेम, त्याग, सहयोग, बड़ों का सम्मान और पारिवारिक एकता का महत्व सिखाया जाए, तो वे बड़े होकर केवल सफल व्यक्ति ही नहीं, बल्कि संवेदनशील इंसान भी बनेंगे। समाज की मजबूती परिवारों से होती है और परिवारों की मजबूती रिश्तों से। यदि रिश्ते ही कमजोर पड़ जाएंगे, तो समाज का ताना-बाना भी बिखरने लगेगा। इसलिए समय की मांग है कि शिक्षा के साथ-साथ नैतिक मूल्यों और रिश्तों की गरिमा को भी महत्व दिया जाए। तभी हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर पाएंगे, जहां संपत्ति से अधिक रिश्तों की कीमत होगी और प्रेम, विश्वास तथा भाईचारा जीवन का आधार बनेगा।







