हाईकोर्ट का स्कूल शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव तथा डी.पी.आई. कमिश्नर को अवमानना का नोंटिस

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जबलपुर। मध्य प्रदेश शासन द्वारा शिक्षको की भर्ती से संवंधित नियमो को ३०/७/२०१८ में बनाया गया था उक्त भर्ती नियमो के नियम 8 तथा अनूसूची तीन में हाई स्कूल शिक्षक की योग्यता संवंधित विषय में द्वितीय श्रेणी में स्नाकोत्तर तथा बी.एड. डिग्री आवश्यक थी | जबकि NCTE के नियमो में हाईस्कूल शिक्षक हेतु संवंधित विषय में स्नाकोत्तर 50% अंक तथा बी.एड. आवश्यक है | मध्य प्रदेश सरकार द्वारा २०१८ में हाईस्कूल शिक्षको की भर्ती हेतु पात्रता परिक्षा का आयोजन किया गया तथा अक्टूबर २०२१ से चयन प्रक्रिया प्रारंभ की गई | दस्तावेज सत्यापन में जिन अभ्यर्थियों की अंकसूची में द्वितीय श्रेणी लिखा था उन्हें चयनित कर दिया गया जबकी उनके कुल प्राप्त अंको का जोड़ ४५% है दूसरी ओर जिन अभ्यर्थियों की अंकसूची में तृतीय श्रेणी लिखा था लेकिन अनके अंक ४५ से ४९.९% थे उनको चयन से बहार का रास्ता दिखा दिया गया | तब कई अभ्यर्थियों द्वारा हाईकोर्ट में याचिकाए दाखिल करके नियमो की संवैधानिकता को दो आधारों पर चुनोती दी गई | पहला आधार यह था की भर्ती नियम 8 की अनुसूची तीन संविधान के अनुच्छेद १४ एवं १६ तथा NCTE के नियमो विरूद्ध है क्युकी प्रदेश तथा देश की अलग-अलग विश्व्विद्यालयो में स्केलिंग की अलग-अलग है कुछ विश्व्विद्यालय ४५% से ५९.९% को द्वितीय श्रेणी मान्य करते है तथा कुछ विश्व्विद्यालय ४५% से ५०% को तृतीय श्रेणी मान्य करते है, जिसके कारण संविधान के अनुच्छेद १४ के विरूद्ध असमानता है तथा याचिका कर्ताओ को संविधान के अनुच्छेद 16 में प्रदत्त नियोजन में समानता के अधिकार से बंचित किया गया है जबकी NCTE जो शिक्षा के क्षेत्र में देश की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था है उक्त संस्था द्वारा प्रकाशित नियमो में श्रेणी का लेख न करके 50% का लेख है | दूसरा मुद्दा यह था की आरक्षित वर्ग को संविधान के अनुच्छेद ३३५ तथा आरक्षण अधिनियम १९९४ के तहत अंको में कम से कम ५% की छूट का प्रावधान है तथा अनुच्छेद १६(१) दिव्यंगो को छूट दिए जाने की व्यवस्था की गई है | लेकिन मध्य प्रदेश शासन द्वारा उक्त भर्ती नियम २०१८ में हाईस्कूल शिक्षको की भर्ती में आरक्षित वर्ग एवं दिव्यंगो को छूट का प्रावधान नही किया गया है | याचिका की सुनवाई के दौरान मध्य प्रदेश शासन ने हाईकोर्ट में नियमो में भाविष्यलक्षी प्रभाव से सुधार करने की सहमती दी गई थी, लेकिन कोर्ट ने शासन की उक्त सहमती को ख़ारिज करके याचिकाओं में विस्तृत फैसला पारित करके उक्त नियमो को भूतलक्षी प्रभाव से असंवैधानिक घोषित कर दिया गया तथा स्पष्ट निर्देश दिए गए की पूर्व की नियुक्ति को डिस्टर्ब किए बिना, याचिका कर्ताओ को दो माह के अन्दर नियुक्ति प्रदान करे तथा उन सभी अभ्यर्थियों को जिन्हें उक्त असंवैधानिक नियम के आधार पर अयोग्य किया गया है उक्त सभी की पूरक भर्ती प्रक्रिया अपनाकर ६ माह के अन्दर भर्ती कम्प्लीट की जाए | लेकिन मध्य प्रदेश शासन के स्कूल शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव ( डॉ.संजय गोयल) तथा डी.पी.आई. कमिश्नर (शिल्पा गुप्ता) ने कोई कार्यवाही नही की गई तब दोनों के विरूद्ध हाईकोर्ट में अनेक याचिका कर्ता/अभ्यर्थियों में हरदा निवासी जो अनूसूचित जनजाति की अभ्यर्थी श्रीमती शिवानी शाह, अनुसूचित जाती के अभ्यर्थी रायसेन निवासी प्रदीप अहिरवार, विदिशा निवासी महेंद्र चौधरी, सागर निवासी हेमंत चौधरी, ओ.बी.सी. वर्ग के अवधेश पाल तथा हुसेन मोहम्मद ने द्वारा अवमानना याचिकाए क्रमांक ३६९३/२०२५, ३७७५/२०२५, ३७७८/२०२५, ३७७३/२०२५, ३७७४/२०२५ तथा ३७७८/२०२५ दाखिल की गई जिनकी प्रारंभिक सुनवाई पर डॉ.संजय गोयल तथा शिल्पा गुप्ता को न्यायालय के आदेश की अवमाना का नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर हाईकोर्ट में उपस्थित होकर जबाब तलब किया गया है |
वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर का कहना है की मध्य प्रदेश की वर्तमान सरकार एवं प्रशासन कई बार न्यायालय में प्रकरणों का हबाला देकर तथा अनेको बार हाईकोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बाबजूद भी आरक्षित वर्ग जिसकी संख्या मध्य प्रदेश में ९२.७९% है उनको संवैधानिक अधिकारों से बंचित किया जा रहा है जिससे स्पष्ट है की प्रदेश में सविधानिक आपातकाल की स्थिति निर्मित हो चुकी है | वरिष्ठ अधिवक्ता का कहना है की मध्य प्रदेश सरकार के पास या तो योग्य विधिक सलाहकार नही है या सरकार जानबूझकर आरक्षित वर्ग की अनदेखी कर रही है | वरिष्ठ अधिवक्ता का कहना है की हाल ही में सरकार ने प्रमोशन का क़ानून बनाया है जिसके विरूद्ध हाईकोर्ट में कई याचिकाए दाखिल हुई है सरकार को सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट में सरकार द्वारा द्वारा हाईकोर्ट के २०१६ के आदेश के विरूद्ध दायर की गई SLP(C) बापिस लेना था तथा २००२ के प्रमोशन नियमो को रिपील करना था फिर नए नियम बनाना था, लेकिन सरकार ने जानबूझकर या विधिक सलाह के आभाव में असंवैधानिक रूप से कार्य करके प्रदेश के लाखो कर्मचारी जो २०१६ से प्रमोशन की आशा में थे उनको अब हाईकोर्ट के आदेश की प्रतीक्षा करना पड़ेगी |

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