राजनीतिक उथल-पुथल के बीच बांग्लादेश में भी हो सकता है तख्तापलट

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ढाका,(ए)। 1971 में पाकिस्तान से आजाद हुआ बांग्लादेश आज फिर उसी दिशा की ओर बढ़ रहा है, जहां से उसने कभी अलगाव चुना था। 2024 के अगस्त में भडक़े छात्र आंदोलनों से शुरू हुई राजनीतिक उथल-पुथल ने पीएम शेख हसीना को देश छोडऩे पर मजबूर कर दिया और इसके बाद सैन्य हस्तक्षेप ने बांग्लादेश की सत्ता व्यवस्था को हिला कर रख दिया। संकट की यह घड़ी तब आई जब सेनाध्यक्ष जनरल वाकर-उज-जमान ने सेना को शेख हसीना के कफ्र्यू आदेश न मानने के निर्देश दिए। इसके बाद सेना के समर्थन से एक अंतरिम सरकार ने सत्ता संभाली। एक रिपोर्ट में राजनीतिक विश्लेषकों से हवाले से बताया गया है कि यह घटनाक्रम 1999 में पाकिस्तान में हुए तख्तापलट से मेल खाता है। उस समय जनरल परवेज मुशर्रफ ने नवाज शरीफ की चुनी हुई सरकार को बेदखल कर दिया था।
दोनों देशों में राजनीतिक अस्थिरता के समय सेना ने सत्ता अपने हाथ में ली थी। लोकतांत्रिक सरकारों को हटाकर सेना समर्थित अस्थायी सरकारों का गठन किया गया।
यूनुस सरकार के खिलाफ देश में सरकारी कर्मचारियों, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। सेना की राजनीति में बढ़ती भूमिका को लेकर लोग चिंतित हैं कि लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर हो रही हैं। रिपोट्र्स के मुताबिक बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं, जो धार्मिक असहिष्णुता और कट्टरता की ओर इशारा करते हैं। यह स्थिति 1971 के पहले के पाकिस्तान जैसी लग रही है, जिससे बांग्लादेश ने खुद को आजाद किया था।
2024 में पहली बार पाकिस्तान के करांची से एक कार्गो जहाज बांग्लादेश के चट्टोग्राम बंदरगाह पहुंचा। यह कदम दोनों देशों के बीच नए व्यापारिक रिश्तों की शुरुआत के रूप में देखा गया। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों और स्थानीय पर्यवेक्षकों ने कहा कि यदि बांग्लादेश ने जल्द चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक शासन की वापसी नहीं की तो देश दीर्घकालिक सैन्य नियंत्रण में फंस सकता है। कुल मिलाकर बांग्लादेश के लिए यह एक नाजुक दौर है। जिस देश ने पाकिस्तान के सैन्य जुल्म से मुक्ति पाई थी, वही आज उसी रास्ते पर जाता नजर आ रहा है।

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