नर्मदा मध्य प्रदेश की जीवन रेखा जहाँ संस्कृति आकार लेती है

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हमारा नगर जबलपुर नर्मदा के तट पर बसा है जिसका सांस्कृतिक, सामाजिक, आध्यात्मिक ,ऐतिहासिक महत्व है नर्मदा महज जल संसाधन नहीं अनेकों की जीवन धारा भी है ‌।हजारों लाखों जीव, वनस्पति ,प्रकृति, खेत ,किसान, सभी की आश्रय दाता है नर्मदा, अतः हम सब का कर्तव्य है नदी को प्रदूषण मुक्त रखें ।नर्मदा की निर्मल धार रहेगी तो जीवन भी निर्मल अबाध चलता रहेगा ,यह सच है कि पानी का कोई विकल्प नहीं है ।जल है तो कल है। आज सभी को नर्मदा के महत्व को समझना ही होगा।
कल-कल निनादनी नर्मदा सामवेद की मूर्ति है नर्मदा की महिमा स्कंद पुराण, पद्म पुराण में भी वर्णित है नर्मदा अमरकंटक से अपने प्राकृट्य रुप मे बालिका की तरह है जो किलकारी भरते हुए आगे बढ़ने लगती है और विस्तारित होने लगती है
नर्मदा का उद्गम स्थल अमरकंटक पर्वत का एक कुंड है जो 3492 फीट की ऊंचाई पर स्थित है मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र के क्षेत्रों से होती हुई नर्मदा खंभात की खाड़ी में समाहित हो जाती है एक पौराणिक कथा के अनुसार ब्रह्मा के नेत्र से दो आँसू गिरे जिनसे नर्मदा और सोन की उत्पत्ति हुई ।
भू वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी की प्रारंभिक अवस्था में प्रथमतय दो नदियों का प्रादुर्भाव हुआ भारत की नर्मदा और मिस्र की नील ,दोनों के तट पर विशिष्ट पुरा संस्कृतियों का विकास हुआ
विश्व की सर्वश्रेष्ठ नदी है नर्मदा यह अद्भुत और विलक्षण है इस नदी का इतिहास भूगोल , शिल्प, कला, साहित्य सभी सुंदर और आकर्षक है
अनेक ऋषियों ने इसके तट पर तप किया नर्मदा सबसे प्राचीन नदी है भृगु ऋषि जिनके नाम पर भृगु घाट (भेड़ाघाट) नाम पड़ा। पार्वती ने नर्मदा तट पर पूजन किया था इसलिए गौरी घाट (ग्वारीघाट) नाम पड़ा। ऐसे अनेकों प्रसंग जबलपुर के नर्मदा तटों से जुड़े हैं।
एक यही नदी है जिसकी 3 वर्ष 3 माह 13 दिन मैं परिक्रमा होती है सिर्फ नर्मदा की ही परिक्रमा होती है बुंदेली। गौडी, निमाड़ी, मराठी ,गुजराती संस्कृतियों का निवास इसके तट पर है
“नर्मदा के स्मरण मात्र से एक जन्म का, दर्शन से तीन जन्म का, और स्नान से सात जन्म का पाप नष्ट होता है”
अनेक विशिष्ट जड़ी-बूटी और औषधियाँ नर्मदा तट के वृक्षों से प्राप्त होती हैं
“नर्मदा का हर कंकर शंकर है जिन्हें बिना प्रतिष्ठा के भी पूज्य माना गया है” नर्मदा का जल दूध की तरह पोषण करता है यह अभदा, जलदा ,सहज संजीवनी है नर्मदा सागर में मिलने के पूर्व डेल्टा नहीं बनाती है ,केवल नर्मदा नदी पर ही पुराण वर्णित है हर अर्थात शिव के पहले नर्मदा का नाम लिया जाता है “नर्मदे हर “संगमरमर पत्थर सिर्फ नर्मदा तट पर ही हैं ।सभी देवी- देवताओं से वंदित नर्मदा से मिलने गंगा भी वैशाख माह में आती है।
नर्मदा पर जितने सुंदर प्रताप हैं किसी नदी पर नहीं है ।लोकगीत, संगीत और स्वर लहरियाँ नर्मदा तट पर सर्वाधिक गूंजती
हैं। तंत्र शक्ति के सर्वाधिक स्थल नर्मदा के तट पर हैं शिल्प कला के अद्भुत नमूने और दर्शन ज्ञान के अबूझे रहस्य भी नर्मदा तट पर हैं ।यही एक नदी है जो सरल मार्ग को छोड़ ,कठिन मार्ग का अनुसरण करती है ।सर्वाधिक आध्यात्मिक आस्था की पोषक नदी है नर्मदा ।
जल ,चट्टान ,प्रपात ,शोर और मोड रेवा के प्रमुख तत्व हैं ।चट्टानों पर बने चित्र, रेत पर बनी नक्काशी, रेवा का अनुपम सौंदर्य दर्शाते हैं ।ओंकारेश्वर ओमकार स्वरूप है ,मंडला में मेखलाकर नर्मदा , दक्षिण गंगा, गौतमी, मंदाकिनी बिपाशा,आदि कई नाम से पुकारा गया है ।प्रकृति की नैसर्गिक सत्ता और सौंदर्य के दर्शन नर्मदा के घाटों पर और तत्वों में होते हैं नर्मदा के दोनों तटों पर अनेकों तीर्थ हैं जहाँ हमारी संस्कृति पोषित होती है नर्मदा हमारी आस्था की नदी है।

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