नई दिल्ली, (आरएनएस)। देशभर में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर जारी बहस के बीच सर्वोच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया पूरी होने का मतलब यह नहीं है कि मतदाता सूची में नए नाम जोडऩे का रास्ता बंद हो जाएगा। प्रारूप मतदाता सूची से जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, वे निर्धारित प्रक्रिया के तहत दोबारा अपना नाम जुड़वाने के लिए आवेदन कर सकते हैं। न्यायालय ने हालांकि केरल, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश में एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए पुनरीक्षण की समय-सीमा बढ़ाने से इनकार कर दिया।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि मतदाता सूची में नाम जोडऩे की प्रक्रिया लगातार जारी रहती है। इसलिए एसआईआर की समय-सीमा अलग से बढ़ाने की आवश्यकता नहीं है। वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एस. नायडू ने अदालत को बताया कि प्रारूप मतदाता सूची में जिन लोगों के नाम शामिल नहीं हैं, वे निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार आवेदन कर सकते हैं। चुनाव में उम्मीदवारों के नामांकन की अंतिम तिथि तक मतदाता सूची में नाम जुड़वाने का विकल्प उपलब्ध रहता है। इससे पुनरीक्षण के दौरान नाम कटने से प्रभावित लोगों को राहत मिल सकती है। सुनवाई के दौरान निर्वाचन आयोग ने स्वीकार किया कि उत्तर प्रदेश में अधिकारियों की ओर से बड़ी संख्या में फॉर्म-7 स्वीकार किए जाने के मामले में अनियमितताएं हुई थीं। फॉर्म-7 का इस्तेमाल मतदाता सूची में किसी व्यक्ति का नाम हटाने के संबंध में आपत्ति दर्ज कराने के लिए किया जाता है।
निर्वाचन आयोग ने न्यायालय को बताया कि इस मामले में सुधार के लिए आवश्यक कदम उठाए गए हैं। साथ ही गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने का आश्वासन भी दिया। इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं को छूट दी कि वे इस तरह की शिकायतें सीधे निर्वाचन आयोग के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं। आयोग इन शिकायतों की जांच कर आवश्यक सुधार कर सकेगा।सुनवाई के दौरान केरल की मतदाता सूची का मामला भी उठा। निर्वाचन आयोग ने बताया कि राज्य में एसआईआर की प्रक्रिया फरवरी में पूरी हो गई थी और इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में इसी मतदाता सूची का इस्तेमाल किया गया था।वहीं, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की ओर से पेश अधिवक्ता जी. प्रकाश ने दावा किया कि केरल में करीब 24 लाख मतदाताओं के नाम अब भी सूची से बाहर हैं। इस पर न्यायालय ने पार्टी से ऐसे लोगों का पूरा विवरण मांगा, जो समय की कमी या अन्य कारणों से अपने आवेदन पत्र जमा नहीं कर पाए थे।
अदालत ने कहा कि संबंधित मतदाताओं की जानकारी मिलने के बाद निर्वाचन आयोग उनके मामलों की जांच कर आवश्यक सुधार कर सकता है।
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से पक्ष रखते हुए आरोप लगाया कि केरल में विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं। उन्होंने मांग की कि प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद निर्वाचन आयोग इस संबंध में विस्तृत हलफनामा दाखिल करे और बताए कि मतदाताओं के नाम हटाने के क्या कारण थे।
इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने निर्वाचन आयोग को संबंधित याचिका और राजू रामचंद्रन की ओर से प्रस्तुत लिखित टिप्पणी, दोनों पर अपना जवाब दाखिल करने को कहा।
न्यायालय की सुनवाई से यह स्पष्ट हुआ है कि विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी मतदाताओं के लिए सूची में अपना नाम शामिल कराने का विकल्प खुला रहेगा। हालांकि, इसके लिए निर्धारित आवेदन प्रक्रिया और नियमों का पालन करना अनिवार्य होगा। अदालत की टिप्पणी उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है, जिनके नाम पुनरीक्षण के दौरान मतदाता सूची से बाहर हो गए हैं और वे आगामी चुनावों में अपने मताधिकार का इस्तेमाल करना चाहते हैं।
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