फ्लैट खरीदारों को वैकल्पिक जमीन देने के बाद निर्माण हटाने का निर्देश, जलस्रोतों की सुरक्षा पर दिया जोर
नई दिल्ली(आरएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि तालाब, जलाशय अथवा सरकारी सामुदायिक उपयोग की जमीन को केवल विकास योजना में रिहायशी या व्यावसायिक क्षेत्र के रूप में दर्शा देने से उसका मूल कानूनी स्वरूप नहीं बदल जाता। यदि राजस्व अभिलेखों में कोई भूमि तालाब या सरकारी पोरम्बोक के रूप में दर्ज है, तो उस पर निजी व्यक्ति मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकता। अदालत ने यह भी साफ किया कि ऐसी जमीन पर निजी इस्तेमाल के लिए पट्टा जारी करना कानून के विरुद्ध है।
तमिलनाडु के तिरुवल्लूर जिले की करीब 1.68 एकड़ जमीन से जुड़े मामले में सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी की। पुराने सरकारी अभिलेखों में संबंधित भूमि को तालाब और सरकारी पोरम्बोक के रूप में दर्ज किया गया था। बाद में इस जमीन पर निजी दावे किए गए और वहां आवासीय तथा व्यावसायिक निर्माण भी कर लिया गया। मामला मद्रास उच्च न्यायालय पहुंचा, जहां जमीन को सरकारी और सामुदायिक जलस्रोत मानते हुए उस पर हुए निर्माण को अवैध ठहराया गया था। इसके बाद संबंधित पक्षों ने उच्चतम न्यायालय में अपील की।
सुप्रीम कोर्ट में जमीन से जुड़े लोगों की ओर से दलील दी गई कि विकास योजना में संबंधित इलाके को मिश्रित आवासीय क्षेत्र के रूप में दर्शाया गया है। इसलिए इसे तालाब की जमीन नहीं माना जाना चाहिए। हालांकि, अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया।
पीठ ने कहा कि किसी शहर की महायोजना या क्षेत्र निर्धारण व्यवस्था पुराने राजस्व अभिलेखों में दर्ज जमीन के कानूनी स्वरूप को समाप्त नहीं कर सकती। किसी क्षेत्र को आवासीय, व्यावसायिक अथवा औद्योगिक घोषित करने का अर्थ यह नहीं है कि वहां मौजूद तालाब या सरकारी सामुदायिक भूमि पर निजी स्वामित्व का अधिकार पैदा हो जाएगा। जलस्रोतों और सार्वजनिक उपयोग की जमीन का संरक्षण कानून के तहत आवश्यक है।
अदालत ने तमिलनाडु एस्टेट्स (उन्मूलन एवं रैयतवारी में परिवर्तन) अधिनियम, 1948 की धारा 14-ए का उल्लेख करते हुए कहा कि गैर-कृषि योग्य और सामुदायिक उपयोग वाली जमीन पर रैयतवारी पट्टा जारी करने की अनुमति नहीं है। इसके बावजूद यदि ऐसा पट्टा जारी किया जाता है, तो वह कानून की नजर में वैध नहीं होगा।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि तालाब के मुख्य हिस्से के अलावा उसकी मेड़ और पानी के आवागमन के रास्ते भी कानूनी संरक्षण के दायरे में आते हैं। इसलिए इन हिस्सों पर भी निजी कब्जे या निर्माण को वैध नहीं ठहराया जा सकता।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उन लोगों की परेशानी पर भी ध्यान दिया, जिन्होंने अपनी जीवनभर की कमाई लगाकर संबंधित परिसर में फ्लैट खरीदे थे। अदालत ने पाया कि सरकारी विभागों ने ही भवन निर्माण की अनुमति दी थी और जमीन के अभिलेखों में भी बदलाव किए गए थे। इन सरकारी मंजूरियों और दस्तावेजों के आधार पर फ्लैट खरीदारों ने निर्माण को वैध मानते हुए अपनी जमा पूंजी निवेश की थी।
अदालत ने माना कि खरीदारों की गलती नहीं होने की स्थिति में उन्हें बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के अचानक बेघर करना उचित नहीं होगा। इसी को ध्यान में रखते हुए शीर्ष अदालत ने मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले में राहत से संबंधित बदलाव किया।
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के मुख्य सचिव और तिरुवल्लूर के जिला कलेक्टर को निर्देश दिया कि फ्लैट मालिकों को दूसरी जगह उतनी ही उपयुक्त जमीन उपलब्ध कराई जाए। यह प्रक्रिया प्राथमिकता के आधार पर पूरी की जाए और संभव हो तो छह महीने के भीतर वैकल्पिक जमीन मुहैया करा दी जाए। इसके बाद संबंधित 0.22 एकड़ हिस्से पर बने फ्लैटों को हटाया जाए। शेष खाली हिस्से में जलस्रोत को बहाल करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकती है।
अदालत ने फ्लैट खरीदारों को यह छूट भी दी कि वे बिल्डर, जमीन मालिक अथवा अन्य संबंधित पक्षों के खिलाफ सक्षम दीवानी अदालत में अपना दावा पेश कर सकते हैं। वहीं, जिन सरकारी अधिकारियों ने भूमि अभिलेखों में अनियमितता की या अपनी जिम्मेदारियों का सही ढंग से निर्वहन नहीं किया, उनके विरुद्ध राज्य सरकार विभागीय और अन्य कानूनी कार्रवाई कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने स्पष्ट संदेश दिया है कि तालाब और अन्य जलस्रोत केवल जमीन के छोटे-बड़े भूखंड नहीं हैं, बल्कि उनका उपयोग पूरे समाज के हित में होता है। इसलिए उनकी सुरक्षा और संरक्षण सरकार की जिम्मेदारी है। सरकारी अभिलेखों में बदलाव करके अथवा विकास योजना में किसी क्षेत्र को आवासीय या व्यावसायिक दर्शाकर जलस्रोतों पर निजी अधिकार नहीं जताया जा सकता।
साथ ही, अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि यदि सरकारी विभागों की मंजूरी और अभिलेखों पर भरोसा करके आम लोगों ने मकान या फ्लैट खरीदे हैं, तो उनकी गलती न होने पर उनके हितों की भी अनदेखी नहीं की जा सकती। इस फैसले में शीर्ष अदालत ने सार्वजनिक जलस्रोतों के संरक्षण और निर्दोष फ्लैट खरीदारों के हितों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया है।








