उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची से नाम हटाने के फॉर्म-७ में गड़बड़ी के आरोप, सुप्रीम कोर्ट ने दिए जांच के निर्देश

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नई दिल्ली(आरएनएस)। उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान नाम हटाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले फॉर्म-७ को लेकर विवाद गहरा गया है। कुछ स्थानों पर बड़ी संख्या में फॉर्म जमा किए जाने और उनमें कथित अनियमितताओं के आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता दिखाई है। अदालत ने चुनाव आयोग को शिकायतों में बताए गए तथ्यों की जांच करने और गड़बड़ी पाए जाने पर आवश्यक सुधारात्मक कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। साथ ही आयोग को इस संबंध में अनुपालन रिपोर्ट भी दाखिल करनी होगी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने उत्तर प्रदेश के कुछ विधानसभा क्षेत्रों में फॉर्म-७ के कथित दुरुपयोग का मुद्दा उठाया। उनका आरोप था कि मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए बड़ी संख्या में ऐसे आवेदन जमा किए गए, जिनकी प्रामाणिकता और प्रक्रिया पर सवाल खड़े होते हैं। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से बताया गया कि उत्तर प्रदेश के एक विधानसभा क्षेत्र में कथित तौर पर ३२ फॉर्म-७ जमा किए गए थे। इन सभी प्रपत्रों में एक ही समुदाय के लोगों के नाम शामिल होने का दावा किया गया। याचिकाकर्ताओं ने इसे गंभीर मामला बताते हुए कहा कि इस तरह की शिकायतों की सामान्य जांच के बजाय विस्तृत पड़ताल की आवश्यकता है।
उन्होंने कुछ फॉर्म की प्रामाणिकता पर भी सवाल उठाए। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, अभिलेखों में मौजूद दो फॉर्म पर बूथ स्तरीय अधिकारियों (बीएलओ) के हस्ताक्षर दिखाई दे रहे थे। इससे यह सवाल खड़ा हुआ कि आवेदन किसने भरे, किस आधार पर जमा किए गए और उनमें अधिकारियों के हस्ताक्षर किस परिस्थिति में आए। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि चुनाव आयोग के जवाब और उपलब्ध दस्तावेजों में कुछ विसंगतियां भी दिखाई देती हैं।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डीएस नायडू ने अदालत को बताया कि आयोग ने इस तरह की शिकायतों की जांच कराई है। संबंधित अधिकारियों ने फॉर्म की पड़ताल करने के साथ उनका दोबारा मिलान भी किया है। आयोग के अनुसार, कुछ शिकायतें जांच में गलत पाई गईं और जिन आवेदनों में गड़बड़ी मिली, उन पर कार्रवाई नहीं की गई।
आयोग की ओर से यह भी कहा गया कि यदि किसी व्यक्ति के पास किसी विशेष फॉर्म या आवेदन में अनियमितता का ठोस प्रमाण है, तो वह इसकी शिकायत कर सकता है। ऐसी शिकायत मिलने पर उसकी जांच कर उचित कदम उठाए जा सकते हैं।
याचिकाकर्ताओं ने आयोग के जवाब पर असंतोष जताते हुए कहा कि केवल शिकायतों को गलत बता देना पर्याप्त नहीं है। जिन दस्तावेजों में आपसी विरोधाभास दिखाई दे रहा है, उनकी अलग-अलग जांच होनी चाहिए। उन्होंने कर्नाटक और तेलंगाना में इसी तरह की शिकायतों के बाद कार्रवाई के निर्देश दिए जाने का भी हवाला दिया। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि उत्तर प्रदेश में प्रभावी कार्रवाई नहीं होने से इस तरह की गतिविधियों को बढ़ावा मिला है।
सुनवाई के बाद मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे जिन अनियमितताओं का उल्लेख कर रहे हैं, उनका पूरा विवरण चुनाव आयोग के अधिवक्ता को लिखित नोट के रूप में उपलब्ध कराएं। इसमें उन मामलों का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए, जिनका अभी तक समाधान नहीं हुआ है।
अदालत ने चुनाव आयोग को इस लिखित नोट में शामिल तथ्यों की जांच करने और यह पता लगाने को कहा है कि फॉर्म जमा करने की प्रक्रिया में वास्तव में कोई अनियमितता हुई है या नहीं। यदि जांच में गड़बड़ी सामने आती है, तो आयोग को उसे दूर करने के लिए आवश्यक कार्रवाई करनी होगी। इसके बाद आयोग को सुप्रीम कोर्ट में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करनी होगी।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि मतदाता सूची में किसी योग्य नागरिक का नाम दर्ज होना उसके मतदान के अधिकार से सीधे जुड़ा है। यदि किसी मतदाता का नाम गलत तरीके से सूची से हटा दिया जाता है, तो वह चुनाव में अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने से वंचित हो सकता है। वहीं, गलत जानकारी या फर्जी दस्तावेजों के आधार पर किसी का नाम हटाने का प्रयास भी गंभीर अनियमितता माना जाएगा।
फॉर्म-७ का इस्तेमाल मतदाता सूची में दर्ज किसी व्यक्ति का नाम हटाने के लिए दावा या आपत्ति दर्ज कराने में किया जाता है। ऐसे में इस प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखना चुनाव आयोग की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब चुनाव आयोग की जांच और अनुपालन रिपोर्ट पर सबकी नजर रहेगी। इससे उत्तर प्रदेश में फॉर्म-७ के कथित दुरुपयोग और दस्तावेजों में बताई गई विसंगतियों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है।

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